अध्याय 2 - श्लोक 30

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥

dehī nityamavadhyo’yaṃ dehe sarvasya bhārata.
tasmātsarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitumarhasi .. 30 ..


यह जीवात्मा सर्वव्यापी होनेके कारण सबके स्थावर-जंगम आदि शरीरों में स्थित है तो भी अवयवरहित और नित्य होनेके कारण सदा—सब अवस्थाओंमें अवध्य ही है।

जिससे कि सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरों का नाश किये जानेपर भी इस आत्मा का नाश नहीं किया जा सकता, इसलिये भीष्मादि सब प्राणियोंके उद्देश्यसे तुझे शोक करना उचित नहीं है ॥ ३० ॥

यहाँ यह कहा गया कि परमार्थ-तत्त्वकी अपेक्षासे शोक या मोह करना नहीं बन सकता। केवल इतना ही नहीं कि परमार्थ-तत्त्वकी अपेक्षासे शोक और मोह नहीं बन सकते, किंतु—

तात्पर्य पढ़ें

देही शरीरी नित्यं सर्वदा सर्वावस्थासु अवध्यो निरवयवत्वाद् नित्यत्वात् च तत्र अवध्यः अयं देहे शरीरे सर्वस्य सर्वगतत्वात् स्थावरादिषु स्थितः अपि।

सर्वस्य प्राणिजातस्य देहे वध्यमाने अपि अयं देही न वध्यो यस्मात् तस्माद् भीष्मादीनि सर्वाणि भूतानि उद्दिश्य न त्वं शोचितुम् अर्हसि ॥ ३० ॥

इह परमार्थतत्त्वापेक्षायां शोको मोहो वा न सम्भवति इति उक्तम्, न केवलं परमार्थ-तत्त्वापेक्षायाम् एव किन्तु—