बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥
vyavasāyātmikā buddhirekeha kurunandana .
bahuśākhā hyanantāśca buddhayo’vyavasāyinām .. 41 ..
हे कुरुनन्दन ! इस कल्याण-मार्ग में व्यवसायात्मिका—निश्चय स्वभाववाली बुद्धि एक ही है, यानी यथार्थ प्रमाणजनित होने के कारण अन्य विपरीत बुद्धियों के शाखाभेदों की बाधक है ।
जो इतर (दूसरी) बुद्धियाँ हैं, जिनके शाखा-भेद के विस्तार से संसार अनन्त, अपार और अनुपरत होता है अर्थात् निरन्तर अत्यन्त विस्तृत होता है, उन अनन्त भेदोंवाली बुद्धियों का, प्रमाणजनित विवेक-बुद्धि के बल से, अन्त हो जाने पर संसार का भी अन्त हो जाता है।
परंतु जो अव्यवसायी हैं, जो प्रमाणजनित विवेक-बुद्धि से रहित हैं उनकी वे बुद्धियाँ बहुत शाखा अर्थात् बहुत भेदोंवाली और प्रति-शाखाभेद से अनन्त होती हैं ॥ ४१ ॥
जिनमें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं है वे—
तात्पर्य पढ़ें
व्यवसायात्मिका निश्चयस्वभावा एका एव बुद्धिः इतरविपरीतबुद्धिशाखाभेदस्य बाधिका सम्यक्प्रमाणजनितत्वाद् इह श्रेयोमार्गे हे कुरुनन्दन ।
याः पुनः इतरा बुद्धयो यासां शाखा-भेदप्रचारवशाद् अनन्तः अपारः अनुपरतः संसारो नित्यप्रततो विस्तीर्णो भवति, प्रमाण-जनितविवेकबुद्धिनिमित्तवशात् च उपरतासु अनन्तभेदबुद्धिषु संसारः अपि उपरमते ।
ता बुद्धयो बहुशाखा बह्व्यः शाखा यासां तां बहुशाखा बहुभेदा इति एतत् । प्रतिशाखा-भेदेन हि अनन्ताः च बुद्धयः, केषाम् अव्यवसायिनां प्रमाणजनितविवेकबुद्धिरहितानाम् इत्यर्थः ॥ ४१ ॥
येषां व्यवसायात्मिका बुद्धिः नास्ति ते—