अध्याय 2 - श्लोक 43

ते च—
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥

te ca—
kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām .
kriyāviśeṣabahulāṃ bhogaiśvaryagatiṃ prati .. 43 ..


कामात्मा—जिन्होंने भोगकामना को ही अपना स्वभाव बना लिया है ऐसे भोगपरायण और स्वर्ग को प्रधान माननेवाले यानी स्वर्ग ही जिनका परम पुरुषार्थ है ऐसे पुरुष जन्मरूप कर्मफल को देनेवाली ही बातें किया करते हैं। कर्म के फल का नाम ‘कर्मफल’ है, जन्मरूप कर्मफल ‘जन्मकर्मफल’ कहलाता है, उसको देनेवाली वाणी ‘जन्मकर्मफलप्रदा’ कही जाती है। ऐसी वाणी कहा करते हैं।

इस प्रकार भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये जो क्रियाओं के भेद हैं वे जिस वाणी में बहुत हों अर्थात् स्वर्ग, पशु, पुत्र आदि अनेक पदार्थ जिस वाणी द्वारा अधिकता से बतलाये जाते हों, ऐसी बहुत-से क्रियाभेदों को बतलानेवाली वाणी को बोलनेवाले वे मूढ़ बारंबार संसार-चक्र में भ्रमण करते हैं, यह अभिप्राय है ॥ ४३ ॥

तात्पर्य पढ़ें

कामात्मानः कामस्वभावाः कामपरा इत्यर्थः। स्वर्गपराः स्वर्गः परः पुरुषार्थो येषां ते स्वर्गपराः स्वर्गप्रधाना जन्मकर्मफलप्रदां कर्मणः फलं कर्मफलं जन्म एव कर्मफलं जन्मकर्मफलं तत् प्रददाति इति जन्मकर्मफलप्रदा तां वाचं प्रवदन्ति इति अनुषज्यते।

क्रियाविशेषबहुलां क्रियाणां विशेषाः क्रियाविशेषाः ते बहुला यस्यां वाचि तां स्वर्गपशुपुत्राद्यर्था यया वाचा बाहुल्येन प्रकाश्यन्ते। भोगैश्वर्यगतिं प्रति भोगः च ऐश्वर्यं च भोगैश्वर्ये तयोः गतिः प्राप्तिः भोगैश्वर्यगतिः तां प्रति साधनभूता ये क्रियाविशेषाः तद्बहुलां तां वाचं प्रवदन्तो मूढाः संसारे परिवर्तन्ते इति अभिप्रायः ॥ ४३ ॥