तावान्सर्वेष वेदेष ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥
yāvānartha udapāne sarvataḥsamplutodake .
tāvānsarveṣa vedeṣa brāhmaṇasya vijānataḥ .. 46 ..
जैसे जगत् में कूप, तालाब आदि अनेक छोटे-छोटे जलाशयों में जितना स्नानपान आदि प्रयोजन सिद्ध होता है, वह सब प्रयोजन सब ओर से परिपूर्ण महान् जलाशय में उतने ही परिमाण में (अनायास) सिद्ध हो जाता है। अर्थात् उसमें उनका अन्तर्भाव है।
इसी तरह सम्पूर्ण वेदों में यानी वेदोक्त कर्मों से जो प्रयोजन सिद्ध होता है अर्थात् जो कुछ उन कर्मों का फल मिलता है, वह समस्त प्रयोजन परमार्थतत्त्व को जाननेवाले ब्राह्मण का यानी संन्यासी का जो सब ओर से परिपूर्ण महान् जलाशयस्थानीय विज्ञान आनन्दरूप फल है, उसमें उतने ही परिमाण में (अनायास) सिद्ध हो जाता है। अर्थात् उसमें उसका अन्तर्भाव है।
श्रुति में भी कहा है कि—‘जिसको वह (रैक्क) जानता है उस (परब्रह्म)-को जो भी कोई जानता है, वह उन सबके फल को पा जाता है कि जो कुछ प्रजा अच्छा कार्य करती है।’ आगे गीता में भी कहेंगे कि ‘सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।’ इत्यादि।
सुतरां यद्यपि कूप, तालाब आदि छोटे जलाशयों की भाँति कर्म अल्प फल देनेवाले हैं तो भी ज्ञाननिष्ठा का अधिकार मिलने से पहले-पहले कर्माधिकारी को कर्म करना चाहिये ॥ ४६ ॥
तात्पर्य पढ़ें
यथा लोके कूपतडागाद्यनेकस्मिन् उदपाने परिच्छिन्नोदके यावान् यावत्परिमाणः स्नानपानादिः अर्थः फलं प्रयोजनं स सर्वः अर्थः सर्वतःसम्प्लुतोदके तावान् एव सम्पद्यते तत्र अन्तर्भवति इत्यर्थः ।
एवं तावान् तावत्परिमाण एव सम्पद्यते सर्वेषु वेदेषु वेदोक्तेषु कर्मसु यः अर्थो यत् कर्मफलम् । सः अर्थो ब्राह्मणस्य सन्न्यासिनः परमार्थतत्त्वं विजानतो यः अर्थो विज्ञानफलं सर्वतःसम्प्लुतोदकस्थानीयं तस्मिन् तावान् एव सम्पद्यते तत्र एव अन्तर्भवति इत्यर्थः ।
‘सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद’ (छा० ४। १। ४) इति श्रुतेः। ‘सर्वं कर्माखिलम्’ इति च वक्ष्यति।
तस्मात् प्राग् ज्ञाननिष्ठाधिकारप्राप्तेः कर्मणि अधिकृतेन कूपतडागाद्यर्थस्थानीयम् अपि कर्म कर्तव्यम् ॥ ४६ ॥