बृद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥
dūreṇa hyavaraṃ karma buddhiyogāddhanañcaya .
bṛddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ .. 49 ..
हे धनंजय ! बुद्धियोग की अपेक्षा, अर्थात् समत्व-बुद्धि से युक्त होकर किये जानेवाले कर्मों की अपेक्षा, कर्मफल चाहनेवाले सकामी मनुष्यों द्वारा किये हुए कर्म, जन्म-मरण आदिके हेतु होनेके कारण अत्यन्त ही निकृष्ट हैं।
इसलिये तू योग विषयक बुद्धिमें या उसके परिपाकसे उत्पन्न होनेवाली सांख्यबुद्धि में, शरण—आश्रय अर्थात् अभयप्राप्तिके हेतुको पानेकी इच्छा कर। अभिप्राय यह कि परमार्थज्ञान की शरणमें जा।
क्योंकि फलतृष्णा से प्रेरित होकर सकाम कर्म करनेवाले कृपण हैं—दीन हैं। श्रुति में भी कहा है—‘हे गार्गी! जो इस अक्षर ब्रह्मको न जानकर इस लोक से जाता है वह कृपण है’॥ ४९ ॥
समत्वबुद्धि से युक्त होकर स्वधर्माचरण करनेवाला पुरुष, जिस फलको पाता है वह सुन—
तात्पर्य पढ़ें
दूरेण अतिविप्रकर्षेण हि अवरं निकृष्टं कर्म
फलार्थिना क्रियमाणं बुद्धियोगात् समत्वबुद्धि-युक्तात् कर्मणो जन्ममरणादिहेतुत्वाद् धनञ्जय !
यत एवं योगविषयायां बुद्धौ तत्परि-पाकजायां वा साङ्ख्यबुद्धौ शरणम् आश्रयम् अभयप्राप्तिकारणम् अन्विच्छ प्रार्थयस्व परमार्थ-ज्ञानशरणो भव इत्यर्थः ।
यतः अवरं कर्म कुर्वाणाः कृपणा दीनाः फलहेतवः फलतृष्णाप्रयुक्ताः सन्तः ‘यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः’ (बृ० ३। ८। १०) इति श्रुतेः ॥ ४९ ॥
समत्वबुद्धियुक्तः सन् स्वधर्मम् अनुतिष्ठन् यत् फलं प्राप्नोति तत् शृणु—