अध्याय 2 - श्लोक 51

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥

karmajaṃ buddhiyuktā hi phalaṃ tyaktvā manīṣiṇaḥ .
janmabandhavinirmuktāḥ padaṃ gacchantyanāmayam .. 51 ..


‘कर्मजम्’ इस पद का ‘फलं त्यक्त्वा’ इस अगले पद से सम्बन्ध है।

कर्मों से उत्पन्न होनेवाली जो इष्टानिष्टदेहप्राप्ति है वही कर्मज फल कहलाता है, समत्वबुद्धियुक्त पुरुष, उस कर्मफल को छोड़कर मनीषी अर्थात् ज्ञानी होकर जीवित अवस्था में ही जन्मबन्धन से निर्मुक्त होकर अर्थात् जन्म नाम के बन्धन से छूटकर विष्णु के मोक्ष नामक अनामय—सर्वोपद्रवरहित परमपद को पा लेते हैं।

अथवा (यों समझो कि) ‘बुद्धियोगाद्धनञ्जय’ इस श्लोकसे लेकर (यहाँतक बुद्धि शब्दसे) कर्मयोगजनित सत्त्वशुद्धिसे उत्पन्न हुई जो सर्वत:संप्लुतोदकस्थानीय परमार्थज्ञानरूपा बुद्धि है वही दिखलायी गयी है; क्योंकि (यहाँ) यह बुद्धि पुण्य-पापके नाश में साक्षात् हेतुरूपसे वर्णित है ॥ ५१ ॥

योगानुष्ठानजनित सत्त्वशुद्धि से उत्पन्न हुई बुद्धि कब प्राप्त होती है ? इस पर कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

कर्मजं फलं त्यक्त्वा इति व्यवहितेन सम्बन्धः ।

इष्टानिष्टदेहप्राप्तिः कर्मजं फलं कर्मभ्यो जातं बुद्धियुक्ताः समत्वबुद्धियुक्ता हि यस्मात् फलं त्यक्त्वा परित्यज्य मनीषिणो ज्ञानिनो भूत्वा जन्मबन्धविनिर्मुक्ता जन्म एव बन्धो जन्मबन्धः तेन विनिर्मुक्ता जीवन्त एव जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः सन्तः पदं परमं विष्णोः मोक्षाख्यं गच्छन्ति अनामयं सर्वोपद्रवरहितम् इत्यर्थः ।

अथवा ‘बुद्धियोगाद्धनञ्जय’ इति आरभ्य परमार्थदर्शनलक्षणा एव सर्वतः सम्प्लुतोदक-स्थानीया कर्मयोगजसत्त्वशुद्धिजनिता बुद्धिः दर्शिता साक्षात् सुकृतदुष्कृतप्रहाणादिहेतुत्व-श्रवणात् ॥ ५१ ॥

योगानुष्ठानजनित सत्त्वशुद्धिजा बुद्धिः कदा प्राप्यते इति उच्यते—