स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥
sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava .
sthitadhī: kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim .. 54 ..
जिसकी बुद्धि इस प्रकार प्रतिष्ठित हो गयी है कि ‘मैं परब्रह्म परमात्मा ही हूँ’, वह स्थितप्रज्ञ है। हे केशव! ऐसे समाधि में स्थित हुए स्थितप्रज्ञ पुरुष की क्या भाषा होती है ? यानी वह अन्य पुरुषों द्वारा किस प्रकार—किन लक्षणों से बतलाया जाता है ?
तथा वह स्थितप्रज्ञ पुरुष स्वयं किस तरह बोलता है ? कैसे बैठता है ? और कैसे चलता है ? अर्थात् उसका बैठना, चलना किस तरह का होता है ?
इस प्रकार इस श्लोक से अर्जुन स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण पूछता है ॥ ५४ ॥
जो पहले से ही कर्मों को त्यागकर ज्ञाननिष्ठा में स्थित है और जो कर्मयोग से (ज्ञाननिष्ठा को प्राप्त हुआ है) उन दोनों प्रकार के स्थितप्रज्ञों के लक्षण और साधन ‘प्रजहाति’ इत्यादि श्लोक से लेकर अध्याय की समाप्ति पर्यन्त कहे जाते हैं।
अध्यात्मशास्त्र में सभी जगह कृतार्थ पुरुष के जो लक्षण होते हैं, वे ही यत्न द्वारा साध्य होने के कारण (दूसरों के लिये) साधन रूप से उपदेश किये जाते हैं। जो यत्नसाध्य साधन होते हैं वे ही (सिद्ध पुरुष के स्वाभाविक) लक्षण होते हैं।
श्रीभगवान् बोले—
तात्पर्य पढ़ें
स्थिता प्रतिष्ठिता अहम् अस्मि परं ब्रह्म इति प्रज्ञा यस्य स स्थितप्रज्ञः तस्य का भाषा किं भाषणं वचनं कथम् असौ परैः भाष्यते समाधिस्थस्य समाधौ स्थितस्य केशव।
स्थितधी: स्थितप्रज्ञः स्वयं वा किं प्रभाषेत। किम् आसीत व्रजेत किम्। आसनं व्रजनं वा तस्य कथम् इत्यर्थः।
स्थितप्रज्ञस्य लक्षणम् अनेन श्लोकेन पृच्छति ॥ ५४ ॥
यो हि आदित एव सन्न्यस्य कर्माणि ज्ञानयोगनिष्ठायां प्रवृत्तो यः च कर्मयोगेन, तयोः स्थितप्रज्ञस्य ‘प्रजहाति’ इति आरभ्य अध्याय-परिसमाप्ति पर्यन्तं स्थितप्रज्ञलक्षणं साधनं च उपदिश्यते।
सर्वत्र एव हि अध्यात्मशास्त्रे कृतार्थलक्षणानि यानि तानि एव साधनानि उपदिश्यन्ते यत्नसाध्यत्वात् । यानि यत्नसाध्यानि साधनानि लक्षणानि च भवन्ति तानि ।