प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥
śrībhagavānuvāca—
prajahāti yadā kāmānsarvānpārtha manogatān .
ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate .. 55 ..
हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित—हृदयमें प्रविष्ट सम्पूर्ण कामनाओं को—सारे इच्छा-भेदोंको भली प्रकार त्याग देता है—छोड़ देता है।
सारी कामनाओं का त्याग कर देनेपर तुष्टिके कारणोंका अभाव हो जाता है और शरीरधारणका हेतु जो प्रारब्ध है, उसका अभाव होता नहीं, अतः शरीर-स्थितिके लिये उस मनुष्यकी उन्मत्त—पूरे पागलके सदृश प्रवृत्ति होगी, ऐसी शङ्का प्राप्त होनेपर कहते हैं—
तब वह अपने अन्तरात्मस्वरूपमें ही किसी बाह्य लाभकी अपेक्षा न रखकर अपने-आप संतुष्ट रहनेवाला अर्थात् परमार्थदर्शनरूप अमृतरसलाभसे तृप्त, अन्य सब अनात्मपदार्थोंसे अलंबुद्धिवाला तृष्णारहित पुरुष स्थितप्रज्ञ कहलाता है अर्थात् जिसकी आत्म-अनात्मके विवेकसे उत्पन्न हुई बुद्धि स्थित हो गयी है, वह स्थितप्रज्ञ यानी ज्ञानी कहा जाता है।
अभिप्राय यह कि पुत्र, धन और लोककी समस्त तृष्णाओं को त्याग देनेवाला संन्यासी ही आत्माराम, आत्मक्रीड़ और स्थितप्रज्ञ है ॥ ५५ ॥
तथा—
तात्पर्य पढ़ें
प्रजहाति प्रकर्षेण जहाति परित्यजति यदा यस्मिन्काले सर्वान् समस्तान् कामान् इच्छाभेदान्। हे पार्थ मनोगतान् मनसि प्रविष्टान् हृदि प्रविष्टान्।
सर्वकामपरित्यागे तुष्टिकारणाभावात्
शरीरधारणनिमित्तशेषे च सति उन्मत्तप्रमत्तस्य
इव प्रवृत्तिः प्राप्ता इति अत उच्यते—
आत्मनि एव प्रत्यगात्मस्वरूपे एव आत्मना स्वेन एव बाह्यलाभनिरपेक्षः तुष्टः परमार्थ-दर्शनामृतरसलाभेन अन्यस्माद् अलम्प्रत्ययवान् स्थितप्रज्ञः स्थिता प्रतिष्ठिता आत्मानात्म-विवेकजा प्रज्ञा यस्य स स्थितप्रज्ञो विद्वान् तदा उच्यते।
त्यक्तपुत्रवित्तलोकैषणः सन्न्यासी आत्माराम
आत्मक्रीड़ः स्थितप्रज्ञ इत्यर्थः ॥ ५५ ॥