स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥
krodhādbhavati sammohaḥ sammohātsmṛtivibhramaḥ .
smṛtibhraṃśād buddhināśo buddhināśātpraṇaśyati .. 63 ..
क्रोध से संमोह अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्यविषयक अविवेक उत्पन्न होता है, क्योंकि क्रोधी मनुष्य मोहित होकर गुरु को ( बड़े को ) भी गाली दे दिया करता है।
मोह से स्मृति का विभ्रम होता है अर्थात् शास्त्र और आचार्य द्वारा सुने हुए उपदेश के संस्कारों से जो स्मृति उत्पन्न होती है उसके प्रकट होने का निमित्त प्राप्त होने पर वह प्रकट नहीं होती।
इस प्रकार स्मृतिविभ्रम होने से बुद्धिका नाश हो जाता है। अन्त:करणमें कार्य–अकार्यविषयक विवेचनकी योग्यताका न रहना, बुद्धिका नाश कहा जाता है।
बुद्धि का नाश होने से (यह मनुष्य) नष्ट हो जाता है, क्योंकि वह तब तक ही मनुष्य है जब तक उसका अन्तःकरण कार्य-अकार्य के विवेचन में समर्थ है, ऐसी योग्यता न रहने पर मनुष्य नष्टप्राय (मनुष्यता से हीन) हो जाता है।
अतः उस अन्तःकरण की (विवेक-शक्तिरूप) बुद्धि का नाश होने से पुरुष का नाश हो जाता है। इस कथन का यह अभिप्राय है कि वह पुरुषार्थ के अयोग्य हो जाता है ॥ ६३ ॥
विषयों के चिन्तन को सब अनर्थों का मूल बतलाया गया। अब यह मोक्ष का साधन बतलाया जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
क्रोधाद् भवति सम्मोहः अविवेकः कार्या-कार्यविषयः। क्रुद्धो हि सम्मूढः सन् गुरुम् अपि आक्रोशति।
सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः शास्त्राचार्योपदेशा-हितसंस्कारजनितायाः स्मृतेः स्याद् विभ्रमो भ्रंशः स्मृत्युत्पत्तिनिमित्तप्राप्तौ अनुत्पत्तिः ।
ततः स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धेः नाशः। कार्या-कार्यविषयविवेकायोग्यता अन्तःकरणस्य बुद्धेः नाश उच्यते।
बुद्धिनाशात् प्रणश्यति। तावद् एव हि
पुरुषो यावद् अन्तःकरणं तदीयं कार्याकार्यविषय- विवेकयोग्यं तदयोग्यत्वे नष्ट एव पुरुषो भवति ।
अतः तस्य अन्तःकरणस्य बुद्धेः नाशात्
प्रणश्यति पुरुषार्थायोग्यो भवति इत्यर्थः ॥ ६३ ॥
सर्वानर्थस्य मूलम् उक्तं विषयाभिध्यानम् अथ इदानीं मोक्षकारणम् इदम् उच्यते—