अध्याय 2 - श्लोक 69

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥

yā niśā sarvabhūtānāṃ tasyāṃ jāgarti saṃyamī.
yasyāṃ jāgrati bhūtāni sā niśā paśyato muneḥ .. 69 ..


तामस स्वभावके कारण सब पदार्थोंका अविवेक करानेवाली रात्रिका नाम निशा है। सब भूतोंकी जो निशा अर्थात् रात्रि है—

वह (निशा) क्या है? (उ०) परमार्थतत्त्व, जो कि स्थितप्रज्ञका विषय है (ज्ञेय है)। जैसे उल्लू आदि रजनीचरोंके लिये दूसरोंका दिन भी रात होती है वैसे ही निशाचरस्थानीय जो सम्पूर्ण अज्ञानी मनुष्य हैं, जिनमें परमार्थतत्त्व-विषयक बुद्धि नहीं है, उन सब भूतोंके लिये अज्ञात होनेके कारण यह परमार्थतत्त्व रात्रिकी भाँति रात्रि है।

उस परमार्थतत्त्वरूप रात्रिमें अज्ञाननिद्रासे जगा

हुआ संयमी अर्थात् जितेन्द्रिय—योगी जागता है।

ग्राह्य-ग्राहकभेदरूप जिस अविद्यारात्रिमें सोते हुए भी सब प्राणी जागते हैं ऐसे कहा जाता है अर्थात् जिस रात्रिमें सब प्राणी सोते हुए स्वप्न देखनेवालोंके सदृश जागते हैं। वह (सारा दृश्य) अविद्यारूप होनेके कारण परमार्थतत्त्वको जाननेवाले मुनिके लिये रात्रि है।

सुतरां (यह सिद्ध हुआ कि) अविद्या-अवस्थामें ही (मनुष्यके लिये) कर्मोंका विधान किया जाता है, विद्यावस्थामें नहीं; क्योंकि जैसे सूर्यके उदय होनेपर रात्रिसम्बन्धी अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञान उदय होनेपर अज्ञान नष्ट हो जाता है।

ज्ञानोत्पत्तिसे पहले-पहले प्रमाणबुद्धिसे ग्रहण की हुई अविद्या ही क्रिया, कारक और फल आदिके भेदोंमें परिणत होकर सब कर्म करवानेका हेतु बन सकती है, अप्रमाणबुद्धिसे ग्रहण की हुई (अविद्या) कर्म करवानेका कारण नहीं बन सकती।

क्योंकि प्रमाणस्वरूप वेदने मेरे लिये अमुक कर्तव्य-कर्मोंका विधान किया है, ऐसा मानकर ही कर्ता कर्ममें प्रवृत्त होता है, यह सब रात्रिकी भाँति अविद्यामात्र है, इस तरह समझकर नहीं होता।

जिसको ऐसा ज्ञान प्राप्त हो गया है कि यह सारा दृश्य रात्रिकी भाँति अविद्यामात्र ही है, उस आत्मज्ञानीका तो सर्व कर्मोंके संन्यासमें ही अधिकार है, प्रवृत्तिमें नहीं।

इस प्रकार ‘तद्बुद्धयस्तदात्मानः’ इत्यादि श्लोकोंसे उस ज्ञानीका अधिकार ज्ञाननिष्ठामें ही दिखलायेंगे।

पू०—उस ज्ञाननिष्ठामें भी (तत्त्ववेत्ताको) प्रवृत्त करनेवाले प्रमाणका (विधिवाक्यका) अभाव है, इसलिये उसमें भी उसकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती।

उ०—यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि आत्मज्ञान अपने स्वरूपको विषय करनेवाला है, अतः अपने स्वरूपज्ञानके विषयमें प्रवृत्त करनेवाले प्रमाणकी अपेक्षा नहीं होती। वह आत्मज्ञान स्वयं आत्मा होनेके कारण स्वतःसिद्ध है और उसीमें सब प्रमाणोंके प्रमाणत्वका अन्त है अर्थात् आत्मज्ञान होनेतक ही प्रमाणोंका प्रमाणत्व है, अतः आत्मस्वरूपका साक्षात् होनेके बाद प्रमाण और प्रमेयका व्यवहार नहीं बन सकता।

(आत्मज्ञानरूप) अन्तिम प्रमाण, आत्माके प्रमातापनको भी निवृत्त कर देता है। उसको निवृत्त करता हुआ वह स्वयं भी जागनेके बाद स्वप्नकालके प्रमाणकी भाँति अप्रमाणी हो जाता है अर्थात् लुप्त हो जाता है।

क्योंकि व्यवहारमें भी वस्तु प्राप्त होनेके बाद कोई प्रमाण (उस वस्तुकी प्राप्तिके लिये) प्रवृत्तिका हेतु होता नहीं देखा जाता।

इसलिये यह सिद्ध हुआ कि आत्मज्ञानीका कर्मोंमें अधिकार नहीं है ॥ ६९ ॥

जिसने तीनों एषणाओंका त्याग कर दिया है, ऐसे स्थितप्रज्ञ विद्वान् संन्यासीको ही मोक्ष मिलता है, भोगोंकी कामना करनेवाले असंन्यासीको नहीं। इस अभिप्रायको दृष्टान्तद्वारा प्रतिपादन करनेकी इच्छा करते हुए भगवान् कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

या निशा रात्रि: सर्वपदार्थानाम् अविवेककरी

तमःस्वभावत्वात् सर्वेषां भूतानां सर्वभूतानाम् ।

किं तत्, परमार्थतत्त्वं स्थितप्रज्ञस्य विषयः ।

यथा नक्तञ्चराणाम् अहः एव सद् अन्येषां

निशा भवति तद्वद् नक्तञ्चरस्थानीयानाम् अज्ञानां

सर्वभूतानां निशा इव निशा परमार्थतत्त्वम् अगोचरत्वाद् अतद्बुद्धीनाम् ।

तस्यां परमार्थतत्त्वलक्षणायाम् अज्ञान-निद्रायाः प्रबुद्धो जागर्ति संयमी संयमवान् जितेन्द्रियो योगी इत्यर्थः ।

यस्यां ग्राह्यग्राहकभेदलक्षणायाम् अविद्या-निशायां प्रसुप्तानि एव भूतानि जाग्रति इति उच्यते यस्यां निशायां प्रसुप्ता इव स्वप्नदृशः सा निशा अविद्यारूपत्वात् परमार्थतत्त्वं पश्यतो मुनेः ।

अतः कर्माणि अविद्यावस्थायाम् एव चोद्यन्ते न विद्यावस्थायाम्। विद्यायां हि सत्याम् उदिते सवितरि शार्वरम् इव तमः प्रणाशम् उपगच्छति अविद्या।

प्राग् विद्योत्पत्तेः अविद्या प्रमाणबुद्ध्या गृह्यमाणा क्रियाकारकफलभेदरूपा सती सर्वकर्महेतुत्वं प्रतिपद्यते। न अप्रमाणबुद्ध्या गृह्यमाणायाः कर्महेतुत्वोपपत्तिः।

प्रमाणभूतेन वेदेन मम चोदितं कर्तव्यं कर्म

इति हि कर्मणि कर्ता प्रवर्तते न अविद्यामात्रम् इदं सर्वं निशा इव इति।

यस्य पुनः निशा इव अविद्यामात्रम् इदं सर्वं

भेदजातम् इति ज्ञानं तस्य आत्मज्ञस्य सर्वकर्मसन्न्यासे एव अधिकारो न प्रवृत्तौ।

तथा च दर्शयिष्यति—‘तद्बुद्धयस्तदात्मानः’ इत्यादिना ज्ञाननिष्ठायाम् एव तस्य अधिकारम्।

तत्र अपि प्रवर्तकप्रमाणाभावे

प्रवृत्त्यनुपपत्तिः इति चेत्।

न, स्वात्मविषयत्वाद् आत्मज्ञानस्य। न हि

आत्मनः स्वात्मनि प्रवर्तकप्रमाणापेक्षता

आत्मत्वाद् एव तदन्तत्वात् च सर्वप्रमाणानां

प्रमाणत्वस्य। न हि आत्मस्वरूपाधिगमे सति

पुनः प्रमाणप्रमेयव्यवहारः सम्भवति।

प्रमातृत्वं हि आत्मनो निवर्तयति अन्त्यं

प्रमाणम्। निवर्तयद् एव च अप्रमाणीभवति

स्वप्नकालप्रमाणम् इव प्रबोधे ।

लोके च वस्त्वधिगमे प्रवृत्तिहेतुत्वादर्शनात्

प्रमाणस्य ।

तस्माद् न आत्मविदः कर्मणि अधिकार इति सिद्धम् ॥ ६९ ॥

विदुषः त्यक्तैषणस्य स्थितप्रज्ञस्य यतेः एव मोक्षप्राप्तिः न तु असन्न्यासिनः कामकामिन इति एतम् अर्थं दृष्टान्तेन प्रतिपादयिष्यन् आह—