निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥
vihāya kāmānyaḥ sarvānpurmāścarati niḥspṛhaḥ .
nirmamo nirahaṅkāraḥ sa śāntimadhigacchati .. 71 ..
जो संन्यासी पुरुष, सम्पूर्ण कामनाओं को और भोगों को अशेषतः त्यागकर अर्थात् केवल जीवनमात्रके निमित्त ही चेष्टा करनेवाला होकर विचरता है।
तथा जो स्पृहासे रहित हुआ है, अर्थात् शरीर-जीवनमात्र में भी जिसकी लालसा नहीं है।
ममतासे रहित है अर्थात् शरीर-जीवनमात्र के लिये आवश्यक पदार्थोंके संग्रह में भी ‘यह मेरा है’ ऐसे भावसे रहित है।
तथा अहंकार से रहित है अर्थात् विद्वत्ता आदिके सम्बन्ध से होनेवाले आत्माभिमानसे भी रहित है।
वह ऐसा स्थितप्रज्ञ, ब्रह्मवेत्ता—ज्ञानी संसारके सर्वदुःखोंकी निवृत्तिरूप मोक्ष नामक परम शान्तिको पाता है अर्थात् ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ ७१ ॥
(अब) उस उपर्युक्त ज्ञाननिष्ठाकी स्तुति की जाती है—
तात्पर्य पढ़ें
विहाय परित्यज्य कामान् यः सन्न्यासी पुमान् सर्वान् अशेषतः कार्त्स्न्येन चरति जीवनमात्रचेष्टाशेषः पर्यटति इत्यर्थः ।
निःस्पृहः शरीरजीवनमात्रे अपि निर्गता स्पृहा यस्य स निःस्पृहः सन्।
निर्ममः शरीरजीवनमात्राक्षिप्तपरिग्रहे अपि
मम इदम् इति अभिनिवेशवर्जितः ।
निरहङ्कारो विद्यावत्त्वादिनिमित्तात्मसम्भावना- रहित इत्यर्थः ।
स एवम्भूतः स्थितप्रज्ञो ब्रह्मवित् शान्तिं सर्वसंसारदुःखोपरमलक्षणां निर्वाणाख्याम् अधि-गच्छति प्राप्नोति ब्रह्मभूतो भवति इत्यर्थः ॥ ७१ ॥
सा एषा ज्ञाननिष्ठा स्तूयते—