स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि
ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥
eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṃ prāpya vimuhyati.
sthitvāsyāmantakāle’pi
brahmanirvāṇamṛcchati .. 72 ..
यह उपर्युक्त अवस्था ब्राह्मी यानी ब्रह्ममें होनेवाली स्थिति है, अर्थात् सर्व कर्मोंका संन्यास करके केवल ब्रह्मरूपसे स्थित हो जाना है।
हे पार्थ! इस स्थितिको पाकर मनुष्य फिर मोहित नहीं होता अर्थात् मोहको प्राप्त नहीं होता।
अन्तकालमें—अन्तके वयमें भी इस उपर्युक्त ब्राह्मी स्थितिमें स्थित होकर मनुष्य, ब्रह्ममें लीनतारूप मोक्षको लाभ करता है। फिर जो ब्रह्मचर्याश्रमसे ही संन्यास ग्रहण करके जीवनपर्यन्त ब्रह्ममें स्थित रहता है वह ब्रह्मनिर्वाणको प्राप्त होता है, इसमें तो कहना ही क्या है?॥ ७२॥
इस गीताशास्त्रके दूसरे अध्यायमें भगवान्ने प्रवृत्तिविषयक योगबुद्धि और निवृत्तिविषयक सांख्यबुद्धि-ऐसी दो बुद्धियाँ दिखलायी हैं।
वहाँ सांख्यबुद्धिका आश्रय लेनेवालोंके लिये ‘प्रजहाति यदा कामान्’ इस श्लोकसे लेकर अध्यायसमाप्तितक, सर्व कर्मोंका त्याग करना कर्तव्य बतलाकर ‘एषा ब्राह्मी स्थितिः’ इस श्लोकमें उसी ज्ञाननिष्ठासे उनका कृतार्थ होना बतलाया है।
परंतु अर्जुनको ‘तेरा कर्ममें ही अधिकार है’ ‘कर्म न करनेमें तेरी प्रीति न होनी चाहिये’ इत्यादि वचनोंसे (ऐसा कहा कि) योगबुद्धिका आश्रय लेकर तुझे कर्म ही करना चाहिये, (पर) उसीसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं बतलायी।
इस बातको विचारकर अर्जुनकी बुद्धि व्याकुल हो गयी और वे बोले—(‘ज्यायसी चेत्’ इत्यादि)।
कल्याण चाहनेवाले भक्तके लिये मोक्षका साक्षात् साधन जो सांख्यबुद्धि-निष्ठा है उसे सुनाकर भी जो प्रत्यक्षीकृत अनेक अनर्थोंसे युक्त हैं और क्रमसे आगे बढ़नेपर भी (इसी जन्ममें) एकमात्र मोक्षकी प्राप्तिरूप फल जिनका निश्चित नहीं है ऐसे कर्मोंमें मुझे भगवान् क्यों लगाते हैं। इस प्रकार अर्जुनका व्याकुल होना उचित ही है।
और उस व्याकुलताके अनुकूल ही यह ‘ज्यायसी चेत्’ इत्यादि प्रश्न है।
इस प्रश्नको निवृत्त करनेवाले वचन भी भगवान्ने पूर्वोक्त विभागविषयक शास्त्रमें (जहाँ ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठाका अलग-अलग वर्णन है) कहे हैं।
तो भी कितने ही टीकाकार अर्जुनके प्रश्नका प्रयोजन दूसरी तरह मानकर उससे विपरीत भगवानका
उत्तर बतलाते हैं तथा पहले भूमिकामें स्वयं जैसा गीताका तात्पर्य बतला आये हैं, उससे भी यहाँ प्रश्न और उत्तरका अर्थ विपरीत प्रतिपादन करते हैं।
कैसे? (सो कहते हैं कि)—वहाँ भूमिकामें तो (उन टीकाकारोंने) ऐसे कहा है कि गीताशास्त्रमें सब आश्रमवालोंके लिये ज्ञान और कर्मका समुच्चय निरूपण किया है और विशेषरूपसे यह भी कहा है कि ‘जबतक जीवे अग्निहोत्रादि कर्म करता रहे’ इत्यादि श्रुतिविहित कर्मोंका त्याग करके केवल ज्ञानसे मोक्ष प्राप्त होता है, इस सिद्धान्तका गीताशास्त्रमें निश्चितरूपसे निषेध है।
परंतु यहाँ (तीसरे अध्यायमें) उन्होंने आश्रमोंका विकल्प दिखलाते हुए ‘जबतक जीवे’ इत्यादि श्रुतिविहित कर्मोंका ही त्याग बतलाया है।
इससे यह शङ्का होती है कि इस प्रकारके विरुद्ध अर्थवाले वचन भगवान् अर्जुनसे कैसे कहते और सुननेवाला (अर्जुन) भी ऐसे विरुद्ध अर्थको कैसे स्वीकार करता?
पू०—यदि वहाँ (भूमिकामें) ऐसा अभिप्राय हो कि गृहस्थके लिये ही श्रौत-कर्मके त्यागपूर्वक केवल ज्ञानसे मोक्षप्राप्तिका निषेध किया है, दूसरे आश्रमवालोंके लिये नहीं, तो?
उ०—यह भी पूर्वापरविरुद्ध ही है; क्योंकि सभी आश्रमवालोंके लिये ज्ञान और कर्मका समुच्चय गीताशास्त्रका निश्चित अभिप्राय है’ ऐसी प्रतिज्ञा करके उसके विपरीत यहाँ दूसरे आश्रमवालोंके लिये वे केवल ज्ञानसे मोक्ष कैसे बतलाते?
पू०—कदाचित् ऐसा मान लें कि यह कहना श्रौतकर्मकी अपेक्षासे है अर्थात् श्रौतकर्मसे रहित केवल ज्ञानसे गृहस्थोंके लिये मोक्षका निषेध किया गया है, उसमें जो, केवल ज्ञानसे गृहस्थोंका मोक्ष नहीं होता, ऐसा कहा है वह विद्यमान स्मार्त-कर्मकी भी अविद्यमानके सदृश उपेक्षा करके कहा है।
उ०—यह भी विरुद्ध है; क्योंकि ‘गृहस्थके लिये ही केवल स्मार्तकर्मके साथ मिले हुए ज्ञानसे मोक्षका प्रतिषेध किया है, दूसरे आश्रमवालोंके लिये नहीं’—यह विचारवान् मनुष्य कैसे मान सकते हैं?
दूसरी बात यह भी है कि यदि ऊर्ध्वरेताओंको मोक्षप्राप्तिके लिये ज्ञानके साथ केवल स्मार्त-कर्मके समुच्चयकी ही आवश्यकता है तो इस न्यायसे गृहस्थोंके लिये भी केवल स्मार्त-कर्मोंके साथ ही ज्ञानका समुच्चय आवश्यक समझा जाना चाहिये, श्रौतकर्मोंके साथ नहीं।
पू०—यदि ऐसा मानें कि गृहस्थको ही मोक्षके लिये श्रौत और स्मार्त दोनों प्रकारके कर्मोंके साथ ज्ञानके समुच्चयकी आवश्यकता है, ऊर्ध्वरेताओंका तो केवल स्मार्त–कर्मयुक्त ज्ञानसे मोक्ष हो जाता है?
उ०—ऐसा मान लेनेसे तो गृहस्थके ही सिरपर विशेष परिश्रमयुक्त और अति दुःखरूप श्रौत-स्मार्त दोनों प्रकारके कर्मोंका बोझ लादना हुआ।
पू०—यदि कहा जाय कि बहुत परिश्रम होनेके कारण गृहस्थकी ही मुक्ति होती है, (अन्य आश्रमोंमें) श्रौत नित्यकर्मोंका अभाव होनेके कारण अन्य आश्रमवालोंका मोक्ष नहीं होता तो?
उ०—यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सब उपनिषद्, इतिहास, पुराण और योगशास्त्रोंमें मुमुक्षुके लिये ज्ञानका अंग मानकर सब कर्मोंके संन्यासका विधान किया है तथा श्रुति-स्मृतियोंमें आश्रमोंके विकल्प और समुच्चयका भी विधान है।*
> ब्रह्मचर्यसे गृहस्थ, गृहस्थसे वानप्रस्थ और वानप्रस्थसे संन्यास ग्रहण करना चाहिये; यह समुच्चयका विधान है और ब्रह्मचर्यसे अथवा गृहस्थसे या वानप्रस्थसे संन्यास ग्रहण करे. यह आश्रमोंके विकल्पका विधान है।
पू०—तब तो सभी आश्रमवालोंके लिये ज्ञान और कर्मका समुच्चय सिद्ध हो जाता है।
उ०—नहीं; क्योंकि मुमुक्षुके लिये सर्व कर्मोंके त्यागका विधान है।
‘सब प्रकारके भोगोंसे विरक्त होकर भिक्षावृत्तिका अवलम्बन करते हैं।’ ‘इसलिये इन सब तपोंमें संन्यासको ही श्रेष्ठ कहते हैं।’ ‘संन्यास ही श्रेष्ठ बताया गया है’ ‘न कर्मसे, न प्रजासे, न धनसे, पर केवल त्यागसे ही कई एक महापुरुष अमृतत्वको प्राप्त हुए हैं।’ ‘ब्रह्मचर्यसे ही संन्यास ग्रहण करें।’ इत्यादि श्रुतिवचन हैं।
बृहस्पतिने भी कचसे कहा है कि ‘धर्म और अधर्मको छोड़, सत्य और झूठ दोनोंको छोड़, सत्य और झूठ दोनोंको छोड़कर जिस (अहंकार) से इनको छोड़ता है उसको भी छोड़।’ ‘संसारको साररहित देखकर परवैराग्यके आश्रित हुए पुरुष, सार वस्तुके दर्शनकी इच्छासे विवाह किये बिना (ब्रह्मचर्य-आश्रमसे) ही संन्यास ग्रहण करते हैं।’
व्यासजीने भी शुकदेवजीको शिक्षा देते समय कहा है कि ‘जीव कर्मोंसे बँधता है और ज्ञानसे मुक्त होता है, इसलिये आत्मतत्त्वके ज्ञाता यति कर्म नहीं करते।’
यहाँ (गीतामें) भी ‘सब कर्मोंको मनसे छोड़कर’ इत्यादि वचन कहे हैं।
मोक्ष अकार्य है अर्थात् किसी क्रियासे प्राप्त होनेवाला नहीं है, इससे भी मुमुक्षुके लिये कर्म व्यर्थ है।
पू०—यदि ऐसा कहें कि प्रत्यवाय* दूर करनेके लिये नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करना आवश्यक है, तो?
> विहित कर्मोंका अनुष्ठान न करनेसे जो पाप लगता है, उसका नाम प्रत्यवाय है।
उ०—यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि प्रत्यवायकी प्राप्ति संन्यासीके लिये नहीं, असंन्यासीके लिये है। जो संन्यासी नहीं है, ऐसे कर्म करनेवाले गृहस्थोंको और ब्रह्मचारियोंको भी जिस प्रकार विहित कर्म न करनेसे प्रत्यवाय होता है, वैसे अग्निहोत्रादि कर्म न करनेसे संन्यासीके लिये प्रत्यवाय-प्राप्तिकी कल्पना नहीं की जा सकती।
तथा नित्यकर्मोंके अभावसे ही भावरूप प्रत्यवायके उत्पन्न होनेकी भी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि ‘असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है?’ इस प्रकार अभावसे भावकी उत्पत्तिको असम्भव बतलानेवाले श्रुतिके वचन हैं।
यदि कहो कि (कर्मोंके अभावसे भावरूप प्रत्यवाय) असम्भव होनेपर भी विहित कर्मोंके न करनेसे प्रत्यवायका होना वेद बतलाता है, तब तो यह कहना हुआ कि वेद अनर्थकारक और अप्रामाणिक है।
क्योंकि (ऐसा माननेसे) वेदविहित कर्मोंके करने और न करने दोनोंहीमें केवल दुःख ही फल हुआ।
इसके सिवा शास्त्र ज्ञापक नहीं बल्कि कारक है अर्थात् अपूर्व शक्ति उत्पन्न करनेवाला है, ऐसा युक्तिशून्य अर्थ भी मानना हुआ*। यह किसीको इष्ट नहीं है।
> वास्तवमें शास्त्र केवल पदार्थोंकी शक्तिको बतलानेवाला है, उसमें नवीन शक्ति उत्पन्न करनेवाला नहीं है।
सुतरां यह सिद्ध हुआ कि संन्यासियोंके लिये कर्म नहीं है, अतएव ज्ञान-कर्मका समुच्चय भी युक्तियुक्त नहीं है।
तथा ‘ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिः’ इत्यादि अर्जुनके प्रश्नोंकी संगति नहीं बैठनेके कारण भी ज्ञान और कर्मका समुच्चय नहीं बन सकता।
क्योंकि यदि दूसरे अध्यायमें भगवान्ने अर्जुनसे यह कहा होता कि ज्ञान और कर्म दोनोंका तुझे एक साथ अनुष्ठान करना चाहिये तो फिर अर्जुनका यह पूछना नहीं बनता कि ‘हे जनार्दन! यदि कर्मोंकी अपेक्षा आप ज्ञानको श्रेष्ठ मानते हैं’ इत्यादि।
यदि भगवान्ने अर्जुनसे यह कहा हो कि तुझे ज्ञान और कर्मका एक साथ अनुष्ठान करना चाहिये, तब जो कर्मोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है, उस ज्ञानका (सम्पादन करनेके लिये) भी कह ही दिया गया, फिर यह पूछना किसी तरह भी नहीं बन सकता कि ‘तो हे केशव! मुझे घोर कर्मोंमें क्यों लगाते हैं।’
ऐसी तो कल्पना की ही नहीं जा सकती कि भगवान्ने पहले ऐसा कह दिया था कि उस श्रेष्ठ ज्ञानका अनुष्ठान अर्जुनको नहीं करना चाहिये, जिससे कि अर्जुनका ‘ज्यायसी चेत्’ इत्यादि प्रश्न बन सके।
हाँ, यदि ऐसा हो कि ज्ञान और कर्मका परस्पर विरोध होनेके कारण एक पुरुषसे एक कालमें (दोनोंका) अनुष्ठान सम्भव नहीं, इसलिये भगवान्ने दोनोंको भिन्न-भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेके योग्य पहले बतलाया है तो ‘ज्यायसी चेत्’ इत्यादि प्रश्न बन सकता है।
यदि ऐसी कल्पना करें कि ‘अर्जुनने यह प्रश्न अविवेकसे किया है’ तो भी भगवान्का यह उत्तर देना युक्तियुक्त नहीं ठहरता कि ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा दोनों भिन्न-भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान की जानेयोग्य हैं।
भगवान्के उत्तरको अज्ञानमूलक मानना तो (सर्वथा) अनुचित है।
अतएव भगवान्के इस उत्तरको कि ‘ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठाका अनुष्ठान करनेवाले अधिकारी भिन्न-भिन्न हैं,’ देखनेसे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानकर्मका समुच्चय सम्भव नहीं।
इसलिये गीतामें और सब उपनिषदोंमें यही निश्चित अभिप्राय है कि केवल ज्ञानसे ही मोक्ष होता है।
यदि दोनोंका समुच्चय सम्भव होता तो ज्ञान और कर्म इन दोनोंमेंसे एकको निश्चय करके कहो, इस प्रकार एक ही बात कहनेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना नहीं बन सकती।
इसके सिवा ‘कुरु कर्मैव तस्मात्त्वम्’ इस निश्चित कथनसे भगवान् भी अर्जुनके लिये (आगे) ज्ञाननिष्ठा असम्भव दिखलायेंगे।
अर्जुन बोले—
तात्पर्य पढ़ें
एषा यथोक्ता ब्राह्मी ब्रह्मणि भवा इयं स्थितिः सर्वं कर्म सन्न्यस्य ब्रह्मरूपेण एव अवस्थानम् इति एतत्।
हे पार्थ न एनां स्थितिं प्राप्य लब्ध्वा विमुह्यति न मोहं प्राप्नोति।
स्थित्वा अस्यां स्थितौ ब्राह्म्यां यथोक्तायाम् अन्तकाले अपि अन्ते वयसि अपि ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मनिर्वृतिं मोक्षं ऋच्छति गच्छति, किमु वक्तव्यं ब्रह्मचर्याद् एव सन्न्यस्य यावज्जीवं यो ब्रह्मणि एव अवतिष्ठते स ब्रह्मनिर्वाणम् ऋच्छति इति ॥ ७२ ॥
शास्त्रस्य प्रवृत्तिनिवृत्तिविषयभूते द्वे बुद्धी भगवता निर्दिष्टे, साङ्ख्ये बुद्धिः योगे बुद्धिः इति च।
तत्र ‘प्रजहाति यदा कामान्’ इति आरभ्य आ-अध्यायपरिसमाप्तेः साङ्ख्यबुद्ध्याश्रितानां सन्न्यासं कर्तव्यम् उक्त्वा तेषां तन्निष्ठतया एव च कृतार्थता उक्ता—‘एषा ब्राह्मी स्थितिः’ इति।
अर्जुनाय च ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ ‘मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि’ इति कर्म एव कर्तव्यम् उक्तवान् योगबुद्धिम् आश्रित्य, न तत एव श्रेयःप्राप्तिम् उक्तवान्।
तद् एतद् आलक्ष्य पर्याकुलीभूतबुद्धिः अर्जुन उवाच—
कथं भक्ताय श्रेयोऽर्थिने यत् साक्षात् श्रेयःसाधनं साङ्ख्यबुद्धिनिष्ठां श्रावयित्वा मां कर्मणि दृष्टानेकानर्थयुक्ते पारम्पर्येण अपि अनैकान्तिकश्रेयःप्राप्तिफले नियुज्याद् इति युक्तः पर्याकुलीभावः अर्जुनस्य ।
तदनुरूपः च प्रश्नः ‘ज्यायसी चेत्’ इत्यादिः ।
प्रश्नापाकरणवाक्यं च भगवता उक्तं यथोक्तविभागविषये शास्त्रे ।
केचित् तु अर्जुनस्य प्रश्नार्थम् अन्यथा कल्पयित्वा तत्प्रतिकलं भगवतः प्रतिवचनं
वर्णयन्ति। यथा च आत्मना सम्बन्धग्रन्थे गीतार्थो निरूपितः तत्प्रतिकूलं च इह पुनः प्रश्नप्रतिवचनयोः अर्थं निरूपयन्ति।
कथम्, तत्र सम्बन्धग्रन्थे तावत्—सर्वेषाम् आश्रमिणां ज्ञानकर्मणोः समुच्चयो गीताशास्त्रे निरूपितः अर्थ इति उक्तम्, पुनः विशेषितं च यावज्जीवश्रुतिचोदितानि कर्माणि परित्यज्य केवलाद् एव ज्ञानाद् मोक्षः प्राप्यते इति एतद् एकान्तेन एव प्रतिषिद्धम् इति।
इह तु आश्रमविकल्पं दर्शयता यावज्जीव-
श्रुतिचोदितानाम् एव कर्मणां परित्याग उक्तः।
तत् कथम् ईदृशं विरुद्धम् अर्थम् अर्जुनाय ब्रूयात् भगवान्, श्रोता वा कथं विरुद्धम् अर्थम् अवधारयेत् ।
तत्र एतत् स्याद् गृहस्थानाम् एव श्रौतकर्म-परित्यागेन केवलाद् एव ज्ञानाद् मोक्षः प्रतिषिध्यते न तु आश्रमान्तराणाम् इति।
एतद् अपि पूर्वोत्तरविरुद्धम् एव। कथम्, सर्वाश्रमिणां ज्ञानकर्मणोः समुच्चयो गीता-शास्त्रे निश्चितः अर्थ इति प्रतिज्ञाय इह कथं तद्विरुद्धं केवलाद् एव ज्ञानाद् मोक्षं ब्रूयाद् आश्रमान्तराणाम्।
अथ मतं श्रौतकर्मापेक्षया एतद् वचनं केवलाद् एव ज्ञानात् श्रौतकर्मरहिताद् गृहस्थानां मोक्षः प्रतिषिध्यते इति। तत्र गृहस्थानां विद्यमानम् अपि स्मार्तं कर्म अविद्यमानवद् उपेक्ष्य ज्ञानाद् एव केवलाद् न मोक्ष इति उच्यते इति।
एतद् अपि विरुद्धम्। कथम्, गृहस्थस्य एव स्मार्तकर्मणा समुच्चिताद् ज्ञानाद् मोक्षः प्रतिषिध्यते न तु आश्रमान्तराणाम् इति कथं विवेकिभिः शक्यम् अवधारयितुम्।
किं च यदि मोक्षसाधनत्वेन स्मार्तानि कर्माणि ऊर्ध्वरेतसां समुच्चीयन्ते तथा गृहस्थस्य अपि इष्यतां स्मार्तैः एव समुच्चयो न श्रौतैः।
अथ श्रौतैः स्मार्तैः च गृहस्थस्य एव समुच्चयो मोक्षाय ऊर्ध्वरेतसां तु स्मार्तकर्ममात्रसमुच्चिताद् ज्ञानाद् मोक्ष इति।
तत्र एवं सति गृहस्थस्य आयासबाहुल्यं श्रौतं स्मार्तं च बहुदुःखरूपं कर्म शिरसि अरोपितं स्यात् ।
अथ गृहस्थस्य एव आयासबाहुल्यकारणाद् मोक्षः स्याद् न आश्रमान्तराणां श्रौतनित्यकर्म-रहितत्वाद् इति।
तद् अपि असत् । सर्वोपनिषत्सु इतिहास-पुराणयोगशास्त्रे च ज्ञानाङ्गत्वेन मुमुक्षोः सर्व-कर्मसन्न्यासविधानाद् आश्रमविकल्पसमुच्चय-विधानात् च श्रुतिस्मृत्योः ।
सिद्धः तर्हि सर्वाश्रमिणां ज्ञानकर्मणोः समुच्चयः ।
न, मुमुक्षोः सर्वकर्मसन्न्यासविधानात् ।
‘व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति ।’ (बृह० उ० ३।५।१) ‘तस्मात्सन्न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः ।’ (ना० उ० २।७९) ‘न्यास एवात्यरेचयत्’ (ना० उ० २।७८) इति ‘न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः’ (ना० उ० २।१२) इति च । ‘ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्’ (जाबा० उ० ४) इत्याद्याः श्रुतयः ।
त्यज धर्ममधर्मं च उभे सत्यानृते त्यज। उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तत्त्यज ॥ संसारमेव निःसारं दृष्ट्वा सारदिदृक्षया । प्रव्रजन्त्यकृतोद्वाहाः परं वैराग्यमाश्रिताः ॥
इति बृहस्पतिः अपि कचं प्रति।
कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते । तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥
(महा० शान्ति० २४१। ७) इति
शुकानुशासनम् ।
इह अपि ‘सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य’ इत्यादि।
मोक्षस्य च अकार्यत्वाद् मुमुक्षोः कर्मानर्थक्यम् ।
नित्यानि प्रत्यवायपरिहारार्थम् अनुष्ठेयानि इति चेत्।
न, असन्न्यासिविषयत्वात् प्रत्यवायप्राप्तेः,
न हि अग्रिकार्याद्यकरणात् सन्न्यासिनः प्रत्यवायः
कल्पयितुं शक्यो यथा ब्रह्मचारिणाम्
असन्न्यासिनाम् अपि कर्मिणाम् ।
न तावद् नित्यानां कर्मणाम् अभावाद् एव भावरूपस्य प्रत्यवायस्य उत्पत्तिः कल्पयितुं शक्या ‘कथमसतः सज्जायेत’ ( छा० उ० ६ । २ ।)
२) इति असतः सज्जन्मासम्भवश्रुतेः ।
यदि विहिताकरणाद् असम्भाव्यम् अपि प्रत्यवायं ब्रूयाद् वेदः तदा अनर्थकरो वेदः अप्रमाणम् इति उक्तं स्यात्।
विहितस्य करणाकरणयोः दुःखमात्र-फलत्वात् ।
तथा च कारकं शास्त्रं न ज्ञापकम् इति अनुपपन्नार्थं कल्पितं स्यात्। न च एतद् इष्टम्।
तस्माद् न सन्न्यासिनां कर्माणि अतो
ज्ञानकर्मणोः समुच्चयानुपपत्तिः ।
‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिः’ इति।
अर्जुनस्य प्रश्नानुपपत्तेः च ।
यदि हि भगवता द्वितीये अध्याये ज्ञानं कर्म च समुच्चयेन त्वया अनुष्ठेयम् इति उक्तं स्यात् ततः अर्जुनस्य प्रश्नः अनुपपन्नो ‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिः जनार्दन’ इति।
अर्जुनाय चेद् बुद्धिकर्मणी त्वया अनुष्ठेये इति उक्ते या कर्मणो ज्यायसी बुद्धिः सा अपि उक्ता एव इति ‘तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव’ इति प्रश्नो न कथञ्चन उपपद्यते।
न च अर्जुनस्य एव ज्यायसी बुद्धिः न अनुष्ठेया इति भगवता उक्तं पूर्वम् इति कल्पयितुं युक्तम्, येन ‘ज्यायसी चेत्’ इति प्रश्नः स्यात्।
यदि पुनः एकस्य पुरुषस्य ज्ञानकर्मणोः विरोधाद् युगपद् अनुष्ठानं न सम्भवति इति भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्वं भगवता पूर्वम् उक्तं स्यात् ततः अयं प्रश्न उपपन्नः ‘ज्यायसी चेत्’ इत्यादिः ।
अविवेकतः प्रश्नकल्पनायाम् अपि भिन्न-
पुरुषानुष्ठेयत्वेन भगवतः प्रतिवचनं न उपपद्यते।
न च अज्ञाननिमित्तं भगवत्प्रतिवचनं कल्प्यम् ।
अस्मात् च भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्वेन ज्ञानकर्म-निष्ठयोः भगवतः प्रतिवचनदर्शनात्, ज्ञानकर्मणोः समुच्चयानुपपत्तिः ।
तस्मात् केवलाद् एव ज्ञानाद् मोक्ष इति एषः अर्थो निश्चितो गीतासु सर्वोपनिषत्सु च।
ज्ञानकर्मणोः एकं वद निश्चित्य इति च एकविषया एव प्रार्थना अनुपपन्ना उभयोः समुच्चयसम्भवे ।
‘कुरु कर्मैव तस्मात्त्वम्’ इति च ज्ञाननिष्ठासम्भवम् अर्जुनस्य अवधारणेन दर्शयिष्यति ।
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो
नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥