ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥
arjuna uvāca—
jyāyasī cetkarmaṇaste matā buddhirjanārdana.
tatkiṃ karmaṇi ghore māṃ niyojayasi keśava .. 1 ..
यदि ज्ञान और कर्म दोनों का समुच्चय भगवान् को सम्मत होता तो फिर ‘कल्याण का वह एक साधन कहिये’ ‘कर्मों से ज्ञान श्रेष्ठ है’ इत्यादि वाक्यों द्वारा अर्जुन का ज्ञान से कर्मों को पृथक् करना अनुचित होता।
क्योंकि (समुच्चय-पक्ष में) कर्म की अपेक्षा उस (ज्ञान)-का फल के नाते श्रेष्ठ होना सम्भव नहीं।
तथा भगवान् ने कर्मों की अपेक्षा ज्ञान को कल्याण-कारक बतलाया और मुझसे ऐसा कहते हैं कि ‘तू अकल्याणकारक कर्म ही कर’ इसमें क्या कारण है—यह सोचकर अर्जुन ने भगवान् को उलाहना-सा देते हुए जो ऐसा कहा कि ‘तो फिर हे केशव! मुझे इस हिंसारूप घोर क्रूर कर्म में क्यों लगाते हैं?’ वह भी उचित नहीं होता।
यदि भगवान् ने स्मार्त-कर्म के साथ ही ज्ञान का समुच्चय सबके लिये कहा होता एवं अर्जुन ने भी ऐसा ही समझा होता, तो उसका यह कहना कि ‘फिर हे केशव! मुझे घोर कर्म में क्यों लगाते हैं?’ कैसे युक्तियुक्त हो सकता?॥ १॥
तात्पर्य पढ़ें
ज्यायसी श्रेयसी चेद् यदि कर्मणः सकाशात् ते तव मता अभिप्रेता बुद्धिः ज्ञानं हे जनार्दन।
यदि बुद्धिकर्मणी समुच्चिते इष्टे तदा एकं श्रेयःसाधनम् इति कर्मणो ज्यायसी बुद्धिः इति कर्मणः अतिरिक्तकरणं बुद्धेः अनुपपन्नम् अर्जुनेन कृतं स्यात्।
न हि तद् एव तस्मात् फलतः अतिरिक्तं स्यात्।
तथा कर्मणः श्रेयस्करी भगवता उक्ता बुद्धिः अश्रेयस्करं च कर्म कुरु इति मां प्रतिपादयति तत् किं नु कारणम् इति भगवत उपालम्भम् इव कुर्वन् तत् किं कस्मात् कर्मणि घोरे क्रूरे हिंसालक्षणे मां नियोजयसि केशव इति च यद् आह तत् च न उपपद्यते।
अथ स्मार्तेन एव कर्मणा समुच्चयः सर्वेषां भगवता उक्तः अर्जुनेन च अवधारितः चेत् तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि इत्यादि कथं युक्तं वचनम् ॥ १ ॥