भुञ्जते ते त्वधं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥
yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ .
bhuñjate te tvadhaṃ pāpā ye pacantyātmakāraṇāt .. 13 ..
यज्ञशिष्ट अन्न का भोजन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं अर्थात् देवयज्ञादि करके उससे बचे हुए अमृत नामक अन्न को भक्षण करना जिनका स्वभाव है, वे सब पापों से अर्थात् गृहस्थ में होनेवाले चक्की, चूल्हे आदिके पाँच पापों से* और प्रमाद से होनेवाले हिंसादिजनित अन्य पापों से भी छूट जाते हैं।
तथा जो उदरपरायण लोग केवल अपने लिये ही अन्न पकाते हैं वे स्वयं पापी हैं और पाप ही खाते हैं ॥ १३ ॥
इसलिये भी अधिकारी को कर्म करना चाहिये, क्योंकि कर्म जगत्-चक्र की प्रवृत्तिका कारण है। कैसे ? सो कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
देवयज्ञादीन् निर्वर्त्य तच्छिष्टम् अशनम् अमृताख्यम् अशितुं शीलं येषां ते यज्ञशिष्टाशिनः सन्तः, मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः सर्वपापैः चुल्यादि- पञ्चसूनाकृतैः प्रमादकृतहिंसादिजनितैः च अन्यैः ।
ये तु आत्मम्भरयो भुञ्जते ते तु अघं पापं स्वयम् अपि पापा ये पचन्ति पाकं निर्वर्तयन्ति आत्मकारणात् आत्महेतोः ॥ १३ ॥
इतः च अधिकृतेन कर्म कर्तव्यम्। जगच्चक्र-
प्रवृत्तिहेतुः हि कर्म। कथम् इति उच्यते—