यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥
annāddhavanti bhūtāni parjanyādannasambhavaḥ
yajñādbhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ .. 14 ..
भक्षण किया हुआ अन्न रक्त और वीर्य के रूपमें परिणत होनेपर उससे प्रत्यक्ष ही प्राणी उत्पन्न होते हैं। पर्जन्यसे अर्थात् वृष्टिसे अन्न की उत्पत्ति होती है और यज्ञसे वृष्टि होती है।
‘अग्निमें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यमें स्थित होती है, सूर्यसे वृष्टि होती है, वृष्टिसे अन्न होता है और अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है’ इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात पायी जाती है।
ऋत्विक् और यजमानके व्यापार का नाम कर्म है और उस कर्मसे जिसकी उत्पत्ति होती है वह अपूर्वरूप यज्ञ कर्मसमुद्भव है अर्थात् वह अपूर्वरूप यज्ञ कर्मसे उत्पन्न होता है ॥ १४ ॥
और उस —
तात्पर्य पढ़ें
अन्नाद् भुक्ताद् लोहितरेतःपरिणतात् प्रत्यक्षं भवन्ति जायन्ते भूतानि। पर्जन्याद् वृष्टेः अन्नस्य सम्भवः अन्नसम्भवः, यज्ञाद् भवति पर्जन्यः—
‘अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥’
(मनु० ३ । ७६) इति स्मृतेः ।
यज्ञः अपूर्वं स च यज्ञः कर्मसमुद्भव ऋत्विग्-यजमानयोः च व्यापारः कर्म ततः समुद्भवो यस्य यज्ञस्य अपूर्वस्य स यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥
तत् च—
- कण्डनं पेषणं चुल्ली उदकम्भश्च मार्जनी। पञ्चसुना गृहस्थस्य पञ्चयज्ञात् प्रणश्यति॥