अध्याय 3 - श्लोक 27

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ २७ ॥

prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ .
ahaṅkāravimūḍhātmā kartāhamiti manyate .. 27 ..


सत्त्व, रजस् और तमस्—इन तीनों गुणोंकी जो साम्यावस्था है, उसका नाम प्रधान या प्रकृति है, उस प्रकृतिके गुणोंसे अर्थात् कार्य और करणरूप* समस्त विकारोंसे लौकिक और शास्त्रीय सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे किये जाते हैं। परंतु अहंकारविमूढात्मा—कार्य और करणके संघातरूप शरीरमें आत्मभावकी प्रतीतिका नाम अहंकार है, उस अहंकारसे जिसका अन्तःकरण अनेक प्रकारसे मोहित हो चुका है ऐसा—देहेन्द्रियके धर्मको अपना धर्म माननेवाला, देहाभिमानी पुरुष अविद्यावश प्रकृतिके कर्मोंको अपनेमें मानता हुआ उन-उन कर्मोंका ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मान बैठता है ॥ २७ ॥

> आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इनका नाम कार्य है। बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा— इनका नाम करण है।

परंतु जो ज्ञानी है—

तात्पर्य पढ़ें

प्रकृतेः प्रकृतिः प्रधानं सत्त्वरजस्तमसां गुणानां साम्यावस्था तस्याः प्रकृतेः गुणैः विकारैः कार्यकरणरूपैः क्रियमाणानि कर्माणि लौकिकानि शास्त्रीयाणि च सर्वशः सर्वप्रकारैः । अहङ्कारविमूढात्मा कार्यकरणसङ्घातात्मप्रत्ययः अहङ्कारः तेन विविधं नानाविधं मूढ आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयम् । कार्यकरणधर्मा कार्यकरणाभिमानी अविद्यया कर्माणि आत्मनि मन्यमानः तत्तत्कर्मणाम् अहं कर्ता इति मन्यते ॥ २७ ॥

यः पुनः विद्वान्—