अध्याय 3 - श्लोक 30

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३० ॥

mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasyādhyātmacetasā .
nirāśīrnirmamo bhūtvā yudhyasva vigatajvaraḥ .. 30 ..


मुझ सर्वात्मरूप सर्वज्ञ परमेश्वर वासुदेव में विवेकबुद्धिसे सब कर्म छोड़कर अर्थात् ‘मैं सब कर्म ईश्वर के लिये सेवक की तरह कर रहा हूँ’ इस बुद्धिसे सब कर्म मुझ में अर्पण करके,

तथा निराशी—आशारहित और निर्मम यानी जिसका मेरापन सर्वथा नष्ट हो चुका हो उसे निर्मम कहते हैं, ऐसा होकर तू शोकरहित हुआ युद्ध कर अर्थात् चिन्ता-संतापसे रहित हुआ युद्ध कर ॥ ३० ॥

‘कर्म करने चाहिये’ ऐसा जो यह मत प्रमाणसहित कहा गया वह यथार्थ है (ऐसा मानकर)—

तात्पर्य पढ़ें

मयि वासुदेवे परमेश्वरे सर्वज्ञे सर्वात्मनि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्य निक्षिप्य अध्यात्मचेतसा विवेकबुद्ध्या अहं कर्ता ईश्वराय भृत्यवत् करोमि इति अनया बुद्ध्या,

किं च निराशीः त्यक्ताशीः निर्ममो ममभावः च निर्गतो यस्य तव स त्वं निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरो विगतसन्तापो विगतशोकः सन् इत्यर्थः ॥ ३० ॥

यद् एतद् मतं कर्म कर्तव्यम् इति सप्रमाणम् उक्तं तत् तथा—

  • त्रिगुणात्मिका मायाके कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय— इन सबके समुदायका नाम ‘गणविभाग’ है और इनकी परस्परकी चेष्टाओंका नाम ‘कर्मविभाग’ है।