अध्याय 3 - श्लोक 32

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥

ye tvetadabhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam .
sarvajñānavimūḍhāṃstānviddhi naṣṭānacetasaḥ .. 32 ..


परंतु जो उनसे विपरीत हैं, मेरे इस मत की निन्दा करते हुए इस मेरे मतके अनुसार आचरण नहीं करते, वे समस्त ज्ञानोंमें अनेक प्रकारसे मूढ़ हैं। सब ज्ञानोंमें मोहित हुए उन अविवेकियोंको तो तू नाश को प्राप्त हुए ही जान ॥ ३२ ॥

तो फिर वे (लोग) किस कारण से आपके मतके अनुसार नहीं चलते ? दूसरे के धर्म का अनुष्ठान करते हैं और स्वधर्माचरण नहीं करते ? आपके प्रतिकूल होकर आपके शासन का उल्लङ्घन करनेके दोषसे क्यों नहीं डरते, इसमें क्या कारण है ? इसपर कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

ये तु तद्विपरीता एतद् मम मतम् अभ्यसूयन्तो न अनुतिष्ठन्ति न अनुवर्तन्ते मे मतं सर्वेषु ज्ञानेषु विविधं मूढाः ते। सर्वज्ञानविमूढान् तान् विद्धि नष्टान् नाशं गतान् अचेतसः अविवेकिनः ॥ ३२ ॥

कस्मात् पुनः कारणात् त्वदीयं मतं न अनुतिष्ठन्ति परधर्मम् अनुतिष्ठन्ति स्वधर्मं च न अनुवर्तन्ते, त्वत्प्रतिकूलाः कथं न बिभ्यति त्वच्छासनातिक्रम दोषात्, तत्र आह—