प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥
sadṛśaṃ ceṣṭate svasyāḥ prakṛterjñānavānapi .
prakṛtiṃ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṃ kariṣyati .. 33 ..
सभी प्राणी एवं ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करते हैं अर्थात् जो पूर्वकृत पुण्य-पाप आदिका संस्कार वर्तमान जन्मादि में प्रकट होता है, उसका नाम प्रकृति है, उसके अनुसार ज्ञानवान् भी चेष्टा किया करता है। फिर मूर्ख की तो बात ही क्या है ?
इसलिये सभी प्राणी (अपनी) प्रकृति अर्थात् स्वभाव की ओर जा रहे हैं, इसमें मेरा या दूसरे का शासन क्या कर सकता है ? ॥ ३३ ॥
यदि सभी जीव अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरूप ही चेष्टा करते हैं, प्रकृति से रहित कोई है ही नहीं, तब तो पुरुष के प्रयत्न की आवश्यकता न रहने से विधि-निषेध बतलानेवाला शास्त्र निरर्थक होगा ? इसपर यह कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
सदृशम् अनुरूपं चेष्टते कस्याः स्वस्याः स्वकीयायाः प्रकृतेः, प्रकृतिः नाम पूर्वकृत-धर्माधर्मादिसंस्कारो वर्तमानजन्मादौ अभिव्यक्तः सा प्रकृतिः तस्याः सदृशम् एव सर्वो जन्तुः ज्ञानवान् अपि किं पुनः मूर्खः।
तस्मात् प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति मम वा अन्यस्य वा ॥ ३३ ॥
यदि सर्वो जन्तुः आत्मनः प्रकृतिसदृशम् एव चेष्टते न च प्रकृतिशून्यः कश्चिद् अस्ति, ततः पुरुषकारस्य विषयानुपपत्तेः, शास्त्रानर्थक्यप्राप्तौ इदम् उच्यते—