अध्याय 3 - श्लोक 35

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥

śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt .
svadharme nidhanaṃ śreyaḥ paradharmo bhayāvahaḥ .. 35 ..


अच्छी प्रकार अनुष्ठान किये गये अर्थात् अंग-प्रत्यंगों सहित सम्पादन किये गये भी पर-धर्म की अपेक्षा गुणरहित भी अनुष्ठान किया हुआ अपना धर्म कल्याणकर है अर्थात् अधिक प्रशंसनीय है।

पर-धर्म में स्थित पुरुष के जीवन की अपेक्षा स्वधर्म में स्थित पुरुष का मरण भी श्रेष्ठ है, क्योंकि दूसरे का धर्म भयदायक है—नरक आदि रूप भय का देनेवाला है ॥ ३५ ॥

अर्जुन बोले—

यद्यपि ‘ध्यायतो विषयान् पुंसः’, ‘रागद्वेषौ ह्यस्य परिपन्थिनौ’ इत्यादि प्रकरणों में अनर्थ का मूल कारण बतलाया गया, पर वह भिन्न-भिन्न प्रकरणों में और अनिश्चित रूप से कहा गया है। इसलिये वह ‘अनर्थों का कारण ठीक यही है।’ इस प्रकार निश्चयपूर्वक और संक्षेप से जानने में आ जाय तो मैं उसके उच्छेद के लिये प्रयत्न करूँ, इस विचार से उसके जानने की इच्छा करते हुए अर्जुन बोले—

तात्पर्य पढ़ें

श्रेयान् प्रशस्यतरः स्वो धर्मः स्वधर्मो विगुणः अपि विगतगुणः अपि अनुष्ठीयमानः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् साद्गुण्येन सम्पादिताद् अपि।

स्वधर्मे स्थितस्य निधनं मरणम् अपि श्रेयः परधर्मे स्थितस्य जीवितात्, कस्मात्, परधर्मो भयावहो नरकादिलक्षणं भयम् आवहति यतः ॥ ३५ ॥

अर्जुन उवाच—

यद्यपि अनर्थमूलं ‘ध्यायतो विषयान् पुंसः’, ‘रागद्वेषौ ह्यस्य परिपन्थिनौ’ इति च उक्तं विक्षिप्तम् अनवधारितं च तद् उक्तम्, तत् संक्षिप्तं निश्चितं च इदम् एव इति ज्ञातुम् इच्छन् अर्जुन उवाच ज्ञाते हि तस्मिन् तदुच्छेदाय यत्नं कुर्याम् इति—