अध्याय 3 - श्लोक 36

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥

atha kena prayukto’yaṃ pāpaṃ carati pūruṣaḥ.
anicchannapi vārṣṇeya balādiva niyojitaḥ .. 36 ..


हे वृष्णिकुल में उत्पन्न हुए कृष्ण! किस प्रधान कारण से प्रयुक्त किया हुआ यह पुरुष स्वयं न चाहता हुआ भी राजा से प्रयुक्त किये हुए सेवक की तरह बलपूर्वक लगाया हुआ-सा पाप-कर्म का आचरण किया करता है?॥ ३६॥

जिसको तू पूछता है, सर्व अनर्थों के कारणरूप उस वैरी के विषय में सुन ( इस उद्देश्य से ) भगवान् बोले— [ आचार्य पहले भगवान् शब्द का अर्थ करते हैं ।]

‘सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, वैराग्य और मोक्ष—इन छः का नाम भग है’ यह ऐश्वर्य आदि छहों गुण बिना प्रतिबन्ध के, सम्पूर्णता से जिस वासुदेव में सदा रहते हैं।

तथा ‘उत्पत्ति और प्रलय को, भूतों के आने और जाने को एवं विद्या और अविद्या को जो जानता है, उसका नाम भगवान् है’ अतः उत्पत्ति आदि सब विषयों को जो भलीभाँति जानते हैं, वे वासुदेव ‘भगवान्’ नाम से वाच्य हैं।

तात्पर्य पढ़ें

अथ केन हेतुभूतेन प्रयुक्तः सन् राज्ञा इव भृत्यः अयं पापं कर्म चरति आचरति पूरुषः स्वयम् अनिच्छन् अपि हे वार्ष्णेय वृष्णिकुलप्रसूत बलाद् इव नियोजितो राज्ञा इव इति उक्तो दृष्टान्तः ॥ ३६ ॥

शृणु त्वं तं वैरिणं सर्वानर्थकरं यं त्वं पृच्छसि—श्रीभगवानुवाच—

‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।

वैराग्यस्याथ मोक्षस्य षण्णां भग इतीरणा ॥’

( विष्णुपु० ६ । ५ । ७४ )

ऐश्वर्यादिषट्कं यस्मिन् वासुदेवे नित्यम् अप्रतिबद्धत्वेन सामस्त्येन च वर्तते।

‘उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्।

वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥’

( विष्णुपु० ६ । ५ । ७८ )

उत्पत्त्यादिविषयं च विज्ञानं यस्य स वासुदेवो वाच्यो भगवान् इति।