महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥
kāma eṣa krodha eṣa rajoguṇasamudbhavaḥ .
mahāśano mahāpāpmā viddhyenamiha vairiṇam .. 37 ..
यह काम जो सब लोगोंका शत्रु है, जिसके निमित्तसे जीवोंको सब अनर्थोंकी प्राप्ति होती है, वही यह काम किसी कारणसे बाधित होनेपर क्रोधके रूपमें बदल जाता है, इसलिये क्रोध भी यही है।
यह काम रजोगुणसे उत्पन्न हुआ है अथवा यों समझो कि रजोगुणका उत्पादक है; क्योंकि उत्पन्न हुआ काम ही रजोगुणको प्रकट करके पुरुषको कर्ममें लगाया करता है।
तथा रजोगुणके कार्य—सेवा आदिमें लगे हुए दुःखित मनुष्योंका ही यह प्रलाप सुना जाता है कि ‘तृष्णा ही हमसे अमुक काम करवाती है’ इत्यादि।
तथा यह काम बहुत खानेवाला है। इसलिये महापापी भी है, क्योंकि कामसे ही प्रेरित हुआ जीव पाप किया करता है। इसलिये इस कामको ही तू इस संसारमें वैरी जान ॥ ३७ ॥
यह काम किस प्रकार वैरी है, सो दृष्टान्तोंसे समझाते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
काम एष सर्वलोकशत्रुः यन्निमित्ता सर्वानर्थप्राप्तिः प्राणिनाम्, स एष कामः प्रतिहतः केनचित् क्रोधत्वेन परिणमते। अतः क्रोधः अपि एष एव।
रजोगुणसमुद्भवो रजोगुणात् समुद्भवो यस्य स कामो रजोगुणसमुद्भवो रजोगुणस्य वा समुद्भवः । कामो हि उद्भूतो रजः प्रवर्तयन् पुरुषं प्रवर्तयति ।
तृष्णया हि अहं कारित इति दुःखितानां
रजःकार्ये सेवादौ प्रवृत्तानां प्रलापः श्रूयते ।
महाशनो महद् अशनम् अस्य इति महाशनः अत एव महापाप्मा। कामेन हि प्रेरितो जन्तुः पापं करोति। अतो विद्धि एनं कामम् इह संसारे वैरिणम् ॥ ३७ ॥
कथं वैरी इति दृष्टान्तैः प्रत्याययति—