कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥ ३९ ॥
āvṛtaṃ jñānametena jñānino nityavairiṇā.
kāmarūpeṇa kaunteya duṣpūreṇānalena ca.. 39 ..
ज्ञानीके (विवेकीके) इस कामरूप नित्य वैरीसे ज्ञान ढका हुआ है। ज्ञानी ही पहलेसे जानता है कि इसके द्वारा मैं अनर्थोंमें नियुक्त किया गया हूँ। इससे वह सदा दुःखी भी होता है। इसलिये यह ज्ञानीका ही नित्य वैरी है मूर्खका नहीं; क्योंकि वह मूर्ख तो तृष्णाके समय उसको मित्रके समान समझता है। फिर जब उसका परिणामरूप दुःख प्राप्त होता है तब समझता है कि ‘तृष्णाके द्वारा मैं दुःखी किया गया हूँ’ पहले नहीं जानता, इसलिये यह ‘काम’ ज्ञानीका ही नित्य वैरी है।
कैसे काम के द्वारा (ज्ञान आच्छादित है ? इसपर कहते हैं—) कामना—इच्छा ही जिसका स्वरूप है, जो अति कष्टसे पूर्ण होता है तथा जो अनल है, भोगोंसे कभी भी तृप्त नहीं होता, ऐसे कामनारूप वैरीद्वारा (ज्ञान आच्छादित है) ॥ ३९ ॥
ज्ञानको आच्छादित करनेवाला होनेके कारण जो सबका वैरी है वह काम कहाँ रहनेवाला है ? अर्थात् उसका आश्रय क्या है ? क्योंकि शत्रुके रहनेका स्थान जान लेनेपर सहजमें ही उसका नाश किया जा सकता है। इसपर कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
आवृतम् एतेन ज्ञानं ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। ज्ञानी हि जानाति अनेन अहम् अनर्थे प्रयुक्तः पूर्वम् एव इति। दुःखी च भवति नित्यम् एव। अतः असौ ज्ञानिनो नित्यवैरी न तु मूर्खस्य। स हि कामं तृष्णाकाले मित्रम् इव पश्यन् तत्कार्ये दुःखे प्राप्ते जानाति, तृष्णया अहं दुःखित्वम् आपादित इति, न पूर्वम् एव अतो ज्ञानिन एव नित्यवैरी।
किंरूपेण, कामरूपेण काम इच्छा एव रूपम् अस्य इति कामरूपः तेन दुष्पूरेण दुःखेन पूरणम् अस्य इति दुष्पूरः तेन अनलेन न अस्य अलं पर्याप्तिः विद्यते इति अनलः तेन ॥ ३९ ॥
किमधिष्ठानः पुनः कामो ज्ञानस्य आवरणत्वेन वैरी सर्वस्य इति अपेक्षायाम् आह ज्ञाते हि शत्रोः अधिष्ठाने सुखेन शत्रुनिबर्हणं कर्तुं शक्यते इति—