मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ ४२ ॥
indriyāṇi parāṇyāhurindriyebhyaḥ paraṃ manaḥ.
manasastu parā buddhiryo buddheḥ paratastu saḥ.. 42 ..
पण्डितजन बाह्य, परिच्छिन्न और स्थूल देह की अपेक्षा सूक्ष्म अन्तरस्थ और व्यापक आदि गुणों से युक्त होने के कारण श्रोत्रादि पञ्च ज्ञानेन्द्रियों को पर अर्थात् श्रेष्ठ कहते हैं।
तथा इन्द्रियों की अपेक्षा संकल्प-विकल्पात्मक मन को श्रेष्ठ कहते हैं और मन की अपेक्षा निश्चयात्मिका बुद्धि को श्रेष्ठ बताते हैं।
एवं जो बुद्धिपर्यन्त समस्त दृश्य पदार्थों के अन्तरव्यापी है, जिसके विषय में कहा है कि उस आत्मा को इन्द्रियादि आश्रयों से युक्त काम ज्ञानावरण द्वारा मोहित किया करता है, वह बुद्धि का (भी) द्रष्टा परमात्मा (सबसे श्रेष्ठ) है ॥ ४२ ॥
तात्पर्य पढ़ें
इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि पञ्च देहं स्थूलं बाह्यं परिच्छिन्नं च अपेक्ष्य सौक्ष्म्यान्तरस्थत्वव्यापि- त्वादि अपेक्ष्य पराणि प्रकृष्टानि आहुः पण्डिताः । तथा इन्द्रियेभ्यः परं मनः सङ्कल्पविकल्पा- त्मकम् । तथा मनसः तु परा बुद्धिः निश्चयात्मिका ।
तथा यः सर्वदृश्येभ्यो बुद्ध्यन्तेभ्यः अभ्यन्तरः, यं देहिनम् इन्द्रियादिभिः आश्रयैः युक्तः कामो ज्ञानावरणद्वारेण मोहयति इति उक्तम्, स बुद्धेः द्रष्टा परमात्मा ॥ ४२ ॥