श्रीभगवानुवाच—
इमं विवस्वते योगं विवस्वान्मनवे प्राह
प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥
इमं विवस्वते योगं विवस्वान्मनवे प्राह
प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥
śrībhagavānuvāca—
imaṃ vivasvate yogaṃ vivasvānmanave prāha
proktavānahamavyayam .
manurikṣvākave’bravīt .. 1 ..
जगत्-प्रतिपालक क्षत्रियों में बल स्थापन करने के लिये मैंने उक्त दो अध्यायों में कहे हुए इस योग को पहले सृष्टिके आदिकाल में सूर्य से कहा था; (क्योंकि) उस योगबल से युक्त हुए क्षत्रिय, ब्रह्मत्व की रक्षा करने में समर्थ होते हैं तथा ब्राह्मण और क्षत्रियों का पालन ठीक तरह हो जाने पर ये दोनों सब जगत् का पालन अनायास कर सकते हैं।
इस योग का फल अविनाशी है, इसलिये यह अव्यय है; क्योंकि इस सम्यक् ज्ञाननिष्ठारूप योग का मोक्षरूप फल कभी नष्ट नहीं होता।
उस सूर्य ने यह योग अपने पुत्र मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र सबसे पहले राजा बननेवाले इक्ष्वाकु से कहा ॥ १ ॥
तात्पर्य पढ़ें
इमम् अध्यायद्वयेन उक्तं योगं विवस्वते आदित्याय सर्गादौ प्रोक्तवान् अहं जगत् परि- पालयितॄणां क्षत्रियाणां बलाधानाय । तेन योग- बलेन युक्ताः समर्था भवन्ति ब्रह्म परिरक्षितुम् । ब्रह्मक्षत्रपरिपालिते जगत् परिपालयितुम् अलम् । अव्ययम् अव्ययफलत्वात् । न हि अस्य सम्यग्दर्शननिष्ठालक्षणस्य मोक्षाख्यं फलं व्येति । स च विवस्वान् मनवे प्राह मनुः इक्ष्वाकवे स्वपुत्राय आदिराजाय अब्रवीत् ॥ १ ॥