अध्याय 4 - श्लोक 11

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥

ye yathā māṃ prapadyante tāṃstathaiva bhajāmyaham
mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ .. 11 ..


जो भक्त जिस प्रकार से—जिस प्रयोजन से—जिस फलप्राप्ति की इच्छा से मुझे भजते हैं, उनको मैं उसी प्रकार भजता हूँ अर्थात् उनकी कामना के अनुसार ही फल देकर मैं उन पर अनुग्रह करता हूँ, क्योंकि उन्हें मोक्ष की इच्छा नहीं होती।

एक ही पुरुष में मुमुक्षुत्व और फलार्थित्व (फल की इच्छा करना) यह दोनों एक साथ नहीं हो सकते।

इसलिये जो फल की इच्छा वाले हैं उन्हें फल देकर, जो फल को न चाहते हुए शास्त्रोक्त प्रकार से कर्म करने वाले और मुमुक्षु हैं, उनको ज्ञान देकर, जो ज्ञानी, संन्यासी और मुमुक्षु हैं, उन्हें मोक्ष देकर तथा आर्तों का दुःख दूर करके, इस प्रकार जो जिस तरह से मुझे भजते हैं, उनको मैं भी वैसे ही भजता हूँ।

राग-द्वेष के कारण या मोह के कारण तो मैं किसी को भी नहीं भजता।

हे पार्थ! मनुष्य सब तरह से बर्तते हुए भी सर्वत्र स्थित मुझ ईश्वर के ही मार्ग का सब प्रकार से अनुसरण करते हैं, जो जिस फल की इच्छा से जिस कर्म के अधिकारी बने हुए (उस कर्म के अनुरूप) प्रयत्न करते हैं, वे ही मनुष्य कहे जाते हैं ॥ ११ ॥

यदि रागादि दोषों का अभाव होने के कारण सभी प्राणियों पर आप ईश्वर की दया समान है एवं आप सब फल देने में समर्थ भी हैं तो फिर सभी मनुष्य मुमुक्षु होकर—यह सारा विश्व वासुदेवरूप है—इस प्रकार के ज्ञान से केवल आपको ही क्यों नहीं भजते? इसका कारण सुन—

तात्पर्य पढ़ें

ये यथा येन प्रकारेण येन प्रयोजनेन यत्फलार्थितया मां प्रपद्यन्ते, तान् तथा एव तत्फलदानेन भजामि अनुगृह्णामि अहम् इति एतत् । तेषां मोक्षं प्रति अनर्थित्वात् ।

न हि एकस्य मुमुक्षुत्वं फलार्थित्वं च युगपत् सम्भवति ।

अतो ये फलार्थिनः तान् फलप्रदानेन, ये यथोक्तकारिणः तु अफलार्थिनो मुमुक्षवः च तान् ज्ञानप्रदानेन, ये ज्ञानिनः सन्न्यासिनो मुमुक्षवः च तान् मोक्षप्रदानेन; तथा आर्तान् आर्तिहरणेन इति एवं यथा प्रपद्यन्ते ये तान् तथा एव भजामि इत्यर्थः ।

न पुनः रागद्वेष निमित्तं मोह निमित्तं वा कञ्चिद् भजामि ।

सर्वथा अपि* सर्वावस्थस्य मम ईश्वरस्य वर्त्म मार्गम् अनुवर्तन्ते मनुष्याः । यत्फलार्थितया यस्मिन् कर्मणि अधिकृता ये प्रयतन्ते ते मनुष्या उच्यन्ते हे पार्थ सर्वशः सर्वप्रकारैः ॥ ११ ॥

यदि तव ईश्वरस्य रागादिदोषाभावात् सर्वप्राणिषु अनुजिघृक्षायां तुल्यायां सर्वफल- प्रदानसमर्थे च त्वयि सति, वासुदेवः सर्वम् इति ज्ञानेन एव मुमुक्षवः सन्तः कस्मात् त्वाम् एव सर्वे न प्रतिपद्यन्ते इति शृणु तत्र कारणम्—