अध्याय 4 - श्लोक 12

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥

kāṅkṣantaḥ karmaṇāṃ siddhiṃ yajanta iha devatāḥ .
kṣipraṃ hi mānuṣe loke siddhirbhavati karmajā .. 12 ..


कर्मोंकी सिद्धि चाहनेवाले अर्थात् फलप्राप्ति की कामना करनेवाले मनुष्य इस लोकमें इन्द्र, अग्नि आदि देवोंकी पूजा किया करते हैं।

श्रुतिमें कहा है कि ‘जो अन्य देवता की इस भावसे उपासना करता है कि वह (देवता) दूसरा है और मैं (उपासक) दूसरा हूँ वह कुछ नहीं जानता, जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है।’

ऐसे उन भिन्नरूपसे देवताओंका पूजन करनेवाले फलेच्छुक मनुष्यों की इस मनुष्यलोकमें (कर्मसे उत्पन्न हुई) सिद्धि शीघ्र ही हो जाती है; क्योंकि मनुष्य-लोकमें शास्त्र का अधिकार है (यह विशेषता है)।

‘क्षिप्रं हि मानुषे लोके’ इस वाक्यमें क्षिप्र विशेषणसे भगवान् अन्य लोकोंमें भी कर्मफलकी सिद्धि दिखलाते हैं।

पर मनुष्य-लोकमें वर्ण-आश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है, यह विशेषता है। उन वर्णाश्रम आदिमें अधिकार रखने वालों के कर्मोंकी कर्मजनित फलसिद्धि शीघ्र होती है ॥ १२ ॥

मनुष्यलोकमें ही वर्णाश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है, अन्य लोकोंमें नहीं, यह नियम किस कारणसे है ? यह बताने के लिये (अगला श्लोक कहते हैं)—

अथवा वर्णाश्रम आदि विभागसे युक्त हुए मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गके अनुसार बर्तते हैं—ऐसा आपने कहा, सो नियमपूर्वक वे आपके ही मार्गका अनुसरण क्यों करते हैं, दूसरेके मार्गका क्यों नहीं करते ? इसपर कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

काङ्क्षन्तः अभीप्सन्तः कर्मणां सिद्धिं फल-निष्पत्तिं प्रार्थयन्तः, यजन्त इह अस्मिन् लोके देवता इन्द्राग्न्याद्याः—

‘अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽह-मस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानाम्’ (बृ० उ० १। ४। १०) इति श्रुतेः।

तेषां हि भिन्नदेवतायाजिनां फलाकाङ्क्षिणां क्षिप्रं शीघ्रं हि यस्मात् मानुषे लोके, मनुष्यलोके हि शास्त्राधिकारः ।

मानुषे लोके वर्णाश्रमादिकर्माधिकार इति विशेषः, तेषां वर्णाश्रमाद्यधिकारिकर्मणां फल-सिद्धिः क्षिप्रं भवति कर्मजा कर्मणो जाता ॥ १२ ॥

मानुषे एव लोके वर्णाश्रमादिकर्माधिकारो न

अन्येषु लोकेषु इति नियमः किन्निमित्तं इति।

अथवा वर्णाश्रमादिप्रविभागोपेता मनुष्या मम वर्त्म अनुवर्तन्ते सर्वश इति उक्तं कस्मात् पुनः कारणाद् नियमेन तव एव वर्त्म अनुवर्तन्ते न अन्यस्य इति उच्यते—

*यहाँ ‘सर्वथापि’ इस कथनसे भाष्यकार का यह अभिप्राय समझमें आता है कि कर्ममार्ग, भक्तिमार्ग आदि किसी भी  मार्गमेंसे किसी भी देवताविशेष के आश्रित होकर बर्तनेवाले भी भगवान्के मार्गके अनुसार बर्तते हैं (देखिये, गीता ९। २३-२४)।