अध्याय 4 - श्लोक 18

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत ॥ १८ ॥

karmaṇyakarma yaḥ paśyedakarmaṇi ca karma yaḥ
sa buddhimānmanuṣyeṣu sa yuktaḥ kṛtsnakarmakṛta .. 18 ..


जो कुछ किया जाय उस चेष्टामात्रका नाम कर्म है। उस कर्ममें जो अकर्म देखता है, अर्थात् कर्मका अभाव देखता है तथा अकर्ममें—शरीरादिकी चेष्टाके अभावमें जो कर्म देखता है। अर्थात् कर्मका करना और न करना दोनों ही कर्ताके अधीन हैं। तथा आत्मतत्त्वकी प्राप्तिसे पूर्व अज्ञानावस्थामें ही सब क्रिया-कारक आदि व्यवहार है, (इसीलिये कर्मका त्याग भी कर्म ही है*) इस प्रकार जो अकर्ममें कर्म देखता है।

> कर्मोंका करना और उनका त्याग करना दोनों ही कर्ताके व्यापाराधीन हैं; जिसमें कर्ताका व्यापार है, वह प्रवृत्ति हो चाहे निवृत्ति, वास्तवमें कर्म ही है; इसलिये अहंकारपूर्वक किया हुआ कर्मत्याग भी वास्तवमें कर्म ही है।

वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है, वह योगी है और वह समस्त कर्मोंको करनेवाला है, इस प्रकार कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवालेकी स्तुति की जाती है।

पू०—‘जो कर्ममें अकर्म देखता है और अकर्ममें कर्म देखता है, यह विरुद्ध बात किस भावसे कही जा रही है?’ क्योंकि कर्म तो अकर्म नहीं हो सकता और अकर्म कर्म नहीं हो सकता, तब देखनेवाला विरुद्ध कैसे देखे?

उ०—वास्तवमें जो अकर्म है वही मूढमति लोगोंको कर्मके सदृश भास रहा है और उसी तरह कर्म अकर्मके सदृश भास रहा है, उसमें यथार्थ तत्त्व देखनेके लिये भगवान्ने ‘कर्मणि अकर्म यः पश्येत्’ इत्यादि वाक्य कहे हैं, इसलिये (उनका कहना) विरुद्ध नहीं है; क्योंकि बुद्धिमान् आदि विशेषण भी तभी सम्भव हो सकते हैं। इसके सिवा यथार्थ ज्ञानको ही जाननेयोग्य कहा जा सकता है (मिथ्या ज्ञानको नहीं)।

तथा ‘जिसको जानकर अशुभसे मुक्त हो जायगा।’ यह भी कहा है सो विपरीत ज्ञानद्वारा (जन्म-मरणरूप) अशुभसे मुक्ति नहीं हो सकती।

सुतरां प्राणियोंने जो कर्म और अकर्मको विपरीतरूपसे समझ रखा है, उस विपरीत ज्ञानको हटानेके लिये ही भगवान् के ‘कर्मण्यकर्म यः’ इत्यादि वचन हैं।

यहाँ ‘कुण्डेमें बेरोंकी तरह’ कर्मका आधार अकर्म नहीं है और उसी तरह अकर्मका आधार कर्म भी नहीं है; क्योंकि कर्मके अभावका नाम अकर्म है।

इसलिये (यही सिद्ध हुआ कि) मृगतृष्णामें जलकी भाँति एवं सीपमें चाँदीकी तरह लोगोंने कर्म और अकर्मको विपरीत मान रखा है।

पू०—कर्मको सब कर्म ही मानते हैं, इसमें कभी फेरफार नहीं होता।

उ०—यह बात नहीं, क्योंकि नाव चलते समय नौकामें बैठे हुए पुरुषको तटके अचल वृक्षोंमें प्रतिकूल गति दीखती है अर्थात् वे वृक्ष उलटे चलते हुए दीखते हैं और जो (नक्षत्रादि) पदार्थ नेत्रोंके पास नहीं होते, बहुत दूर होते हैं, उन चलते हुए पदार्थोंमें भी गतिका अभाव दीख पड़ता है अर्थात् वे अचल दीखते हैं।

इसी तरह यहाँ भी अकर्ममें (क्रियारहित आत्मामें) ‘मैं करता हूँ’ यह कर्मका देखना और (त्यागरूप) कर्ममें (मैं कुछ नहीं करता इस) अकर्मका देखना ऐसे विपरीत देखना होता है, अतः उसका निराकरण करनेके लिये ‘कर्मणि अकर्म यः पश्येत्’ इत्यादि वचन भगवान् कहते हैं।

यद्यपि यह विषय अनेक बार शंका-समाधानोंद्वारा सिद्ध किया जा चुका है तो भी अत्यन्त विपरीत ज्ञानकी भावनासे अत्यन्त मोहित हुए लोग अनेक बार सुने हुए तत्त्वको भी भूलकर मिथ्या प्रसंग ला-लाकर शंका करने लग जाते हैं, इसलिये तथा आत्मतत्त्वको दुर्विज्ञेय समझकर भगवान् पुनः-पुनः उत्तर देते हैं।

श्रुति, स्मृति और न्यायसिद्ध जो आत्मामें कर्मोंका अभाव है वह ‘अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम्’ ‘न जायते म्रियते’ इत्यादि श्लोकोंसे कहा जा चुका और आगे भी कहा जायगा।

उस क्रियारहित आत्मामें अर्थात् अकर्ममें कर्मका देखनारूप जो विपरीत दर्शन है, यह लोगोंमें अत्यन्त स्वाभाविक-सा हो गया है।

क्योंकि ‘कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषयमें बुद्धिमान् भी मोहित हैं।’

अर्थात् देह-इन्द्रियादिसे होनेवाले कर्मोंका आत्मामें अध्यारोप करके ‘मैं कर्ता हूँ’ ‘मेरा यह कर्म है’ ‘मुझे इसका फल भोगना है’ इस प्रकार (लोग मानते हैं।)

तथा ‘मैं चुप होकर बैठता हूँ जिससे कि परिश्रमरहित और कर्मरहित होकर सुखी हो जाऊँ’ इस प्रकार देह-इन्द्रियोंके व्यापारकी उपरामताका और उससे होनेवाले सुखीपनका आत्मामें अध्यारोप करके ‘मैं कुछ भी नहीं करता हूँ’ ‘चुपचाप सुखसे बैठा हूँ’ इस प्रकार लोग मानते हैं।

लोगोंके इस विपरीत ज्ञानको हटानेके लिये ‘कर्मणि अकर्म यः पश्येत्’ इत्यादि वचन भगवान्ने कहे हैं।

यहाँ देहेन्द्रियादिके आश्रयसे होनेवाला कर्म यद्यपि क्रियारूप है तो भी उसका लोगोंने कर्मरहित अविक्रिय आत्मामें अध्यारोप कर रखा है; क्योंकि शास्त्रज्ञ विद्वान् भी ‘मैं करता हूँ’ ऐसा मान बैठता है।

अतः नदी-तीरस्थ वृक्षोंमें भ्रमसे प्रतिकूल गति प्रतीत होनेकी भाँति अज्ञानसे आत्माके नित्य सम्बन्धी माने जाकर जो लोकमें कर्म नामसे प्रसिद्ध हो रहे हैं, उन कर्मोंमें वस्तुतः नदी-तीरस्थ वृक्षोंमें गतिका अभाव देखनेकी भाँति जो अकर्म देखता है अर्थात् कर्माभाव देखता है,

तथा कर्मकी भाँति आत्मामें अज्ञानसे आरोपित किये हुए शरीर, इन्द्रिय आदिकी उपरामतारूप अकर्ममें, अर्थात् क्रियाके त्यागमें भी ‘मैं कुछ न करता हुआ चुपचाप सुखपूर्वक बैठा हूँ’ इस अहंकारका सम्बन्ध होनेके कारण जो कर्म देखता है यानी उस त्यागको भी जो कर्म समझता है।

इस प्रकार जो कर्म और अकर्मके विभागको (तत्त्वसे) जाननेवाला है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान्—पण्डित है, वह युक्त—योगी है और सम्पूर्ण कर्म करनेवाला भी वही है अर्थात् वह पुण्य-पापरूप अशुभसे मुक्त हुआ कृतकृत्य है।

कई टीकाकार इस श्लोककी दूसरी तरहसे ही व्याख्या करते हैं। कैसे? ईश्वरके लिये किये जानेवाले जो (पञ्चमहायज्ञादि) नित्यकर्म हैं, उनका फल नहीं मिलता इस कारण वे गौणी वृत्तिसे अकर्म कहे जाते हैं? (इसी प्रकार) उन नित्यकर्मोंके न करनेका नाम अकर्म है, वह भी पापरूप फलके देनेवाला होनेके कारण गौणरूपसे ही कर्म कहा जाता है।

जैसे कोई गौ ब्यायी हुई होनेपर भी यदि दूधरूप फल नहीं देती तो वह अगौ कह दी जाती है, वैसे ही नित्यकर्ममें, उसके फलका अभाव होनेके कारण जो अकर्म देखता है और नित्यकर्मका न करनारूप जो अकर्म है उसमें कर्म देखता है; क्योंकि वह नरकादि विपरीत फल देनेवाला है।

यह व्याख्या ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकार जाननेसे अशुभसे मुक्ति नहीं हो सकती अर्थात् जन्म-मरण-बन्धन नहीं टूट सकता। अतः यह अर्थ मान लेनेसे भगवान्के कहे हुए ये वचन कि ‘जिसको जानकर तू अशुभसे मुक्त हो जायगा।’ कट जायँगे।

क्योंकि नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे तो शायद अशुभसे छुटकारा हो भी जाय, परंतु उन नित्यकर्मोंका फल नहीं होता, इस ज्ञानसे तो मोक्ष हो ही नहीं सकता। क्योंकि नित्यकर्मोंका फल नहीं होता, यह ज्ञान या नित्यकर्मोंका ज्ञान अशुभसे मुक्त कर देनेवाला है, ऐसा शास्त्रोंमें कहीं नहीं कहा और न भगवान्‌ने ही गीताशास्त्रमें कहीं ऐसा कहा है।

इसी युक्तिसे (उनके बतलाये हुए) अकर्ममें कर्मदर्शनका भी खण्डन हो जाता है। क्योंकि यहाँ (गीतामें) नित्यकर्मोंके अभावरूप अकर्ममें कर्म देखनेको कहीं कर्तव्यरूपसे विधान नहीं किया, केवल नित्यकर्मकी कर्तव्यताका विधान है।

इसके सिवा ‘नित्यकर्म न करनेसे पाप होता है’ ऐसा जान लेनेसे ही कोई फल नहीं हो सकता। और यह नित्यकर्मका न करनारूप अकर्म शास्त्रोंमें कोई जाननेयोग्य विषय भी नहीं बताया गया है।

तथा इस प्रकार दूसरे टीकाकारोंके माने हुए ‘कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शन’ रूप इस मिथ्यादर्शनसे ‘अशुभसे मुक्ति’ ‘बुद्धिमत्ता’ ‘युक्तता’ ‘सर्व-कर्मकर्तृत्व’ इत्यादि फल भी सम्भव नहीं और ऐसे मिथ्याज्ञानकी स्तुति भी नहीं बन सकती।

जब कि मिथ्याज्ञान स्वयं ही अशुभरूप है, तब वह दूसरे अशुभसे किसीको कैसे मुक्त कर सकेगा? क्योंकि अन्धकार (कभी) अन्धकारका नाशक नहीं हो सकता।

पू०—यहाँ जो कर्ममें अकर्म देखना और अकर्ममें कर्म देखना (उन टीकाकारोंने) बतलाया है, वह मिथ्याज्ञान नहीं है किंतु फलके होने और न होनेके निमित्तसे गौणरूपसे देखना है।

उ०—यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि गौणरूपसे कर्मको अकर्म और अकर्मको कर्म जान लेनेसे भी कोई लाभ नहीं सुना गया। इसके सिवा श्रुतिसिद्ध बातको छोड़कर श्रुतिविरुद्ध बातकी कल्पना करनेमें कोई विशेषता भी नहीं दिखलायी देती।

(भगवान्को यदि यही अभीष्ट होता तो वे) उसी प्रकारके शब्दोंसे भी स्पष्ट कह सकते थे कि ‘नित्य–कर्मोंका कोई फल नहीं है और उनके न करनेसे नरक–प्राप्ति होती है।’ फिर इस प्रकार ‘कर्ममें जो अकर्म देखता है’ इत्यादि दूसरोंको मोहित करनेवाले मायायुक्त वचन कहनेसे क्या प्रयोजन था।

इस प्रकार उपर्युक्त अर्थ करनेवालोंका तो स्पष्ट ही यह मानना हुआ कि ‘भगवान्द्वारा कहे हुए वचन संसारको मोहित करनेके लिये हैं।’

इसके सिवा न तो यह कहना ही उचित है कि यह नित्यकर्म-अनुष्ठानरूप विषय मायायुक्त वचनोंसे गुप्त रखनेयोग्य है और न यही कहना ठीक है कि (यह विषय बड़ा गहन है इसलिये) बारंबार दूसरे-दूसरे शब्दोंद्वारा कहनेसे सुबोध होगा।

क्योंकि ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ इस श्लोकमें स्पष्ट कहे हुए अर्थको फिर कहनेकी आवश्यकता नहीं होती।

तथा सभी जगह जो बात करनेयोग्य होती है, वही प्रशंसनीय और जाननेयोग्य बतलायी जाती है। निरर्थक बातको ‘जाननेयोग्य है’ ऐसा नहीं कहा जाता।

मिथ्याज्ञान या उसके द्वारा स्थापित की हुई आभासमात्र वस्तु जाननेयोग्य नहीं हो सकती।

इसके सिवा नित्यकर्मोंके न करनेरूप अभावसे प्रत्यवायरूप भावकी उत्पत्ति भी नहीं हो सकती। क्योंकि ‘नासतो विद्यते भावः’ इत्यादि भगवान्के वाक्य हैं तथा ‘असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है?’ इत्यादि श्रुतिवाक्य भी पहले दिखलाये जा चुके हैं।

इस प्रकार असत्से सत्की उत्पत्तिका निषेध कर दिया जानेपर भी जो असत्से सत्की उत्पत्ति बतलाते हैं, उनका तो यह कहना हुआ कि असत् तो सत् होता है और सत् असत् होता है, परंतु यह सब प्रमाणोंसे विरुद्ध होनेके कारण अयक्त है।

तथा शास्त्र भी निरर्थक कर्मोंका विधान नहीं कर सकता, क्योंकि सभी कर्म (परिश्रमकी दृष्टिसे) दुःखरूप हैं और जान-बूझकर (बिना प्रयोजन) किसीका भी दुःखमें प्रवृत्त होना सम्भव नहीं।

तथा उन नित्यकर्मोंको न करनेसे नरकप्राप्ति होती है, ऐसा शास्त्रका आशय मान लेनेपर तो यह मानना हुआ कि कर्म करने और न करनेमें दोनों प्रकारसे शास्त्र अनर्थका ही कारण है, अतः व्यर्थ है।

इसके सिवा, ‘नित्यकर्मोंका फल नहीं है’, ऐसा मानकर फिर उनको मोक्षरूप फलके देनेवाला कहनेसे उन व्याख्याकारोंके मतमें स्ववचोविरोध भी होता है।

सुतरां ‘कर्मणि अकर्म यः पश्येत्’ इत्यादि श्लोकका अर्थ जैसा (गुरुपरम्परासे) सुना गया है, वही ठीक है और हमने भी उसीके अनुसार इस श्लोककी व्याख्या की है ॥ १८ ॥

उपर्युक्त कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनकी स्तुति करते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

कर्मणि कर्म क्रियते इति व्यापारमात्रं तस्मिन् कर्मणि अकर्म कर्माभावं यः पश्येद् अकर्मणि च कर्माभावे कर्तृतन्त्रत्वात् प्रवृत्तिनिवृत्त्योः वस्तु अप्राप्य एव हि सर्व एव क्रियाकारकादिव्यवहारः अविद्याभूमौ एव कर्म यः पश्येत् पश्यति।

स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तो योगी कृत्स्नकर्मकृत् समस्तकर्मकृत् च स इति स्तूयते कर्माकर्मणोः इतरेतरदर्शी ।

ननु किम् इदं विरुद्धम् उच्यते ‘कर्मणि अकर्म यः पश्येद् इति अकर्मणि च कर्म इति।’ न हि कर्म अकर्म स्याद् अकर्म वा कर्म तत्र विरुद्धं कथं पश्येद् द्रष्टा।

ननु अकर्म एव परमार्थतः सत् कर्मवद् अवभासते मूढदृष्टेः लोकस्य तथा कर्म एव अकर्मवत् तत्र यथाभूतदर्शनार्थम् आह भगवान् ‘कर्मणि अकर्म यः पश्येत्’ इत्यादि। अतो न विरुद्धम्। बुद्धिमत्त्वाद्युपपत्तेः च। बोद्धव्यम् इति च यथा भूतदर्शनम् उच्यते।

न च विपरीतज्ञानाद् अशुभाद् मोक्षणं स्यात्

‘यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्’ इति च उक्तम् ।

तस्मात् कर्माकर्मणी विपर्ययेण गृहीते प्राणिभिः तद्विपर्ययग्रहणनिवृत्त्यर्थं भगवतो वचनम् ‘कर्मणि अकर्म यः’ इत्यादि।

न च अत्र कर्माधिकरणम् अकर्म अस्ति कुण्डे बदराणि इव न अपि अकर्माधिकरणं कर्म अस्ति कर्माभावत्वाद् अकर्मणः ।

अतो विपरीतगृहीते एव कर्माकर्मणी लौकिकैः यथा मृगतृष्णिकायाम् उदकं शुक्तिकायां वा रजतम्।

ननु कर्म कर्म एव सर्वेषां न क्वचिद् व्यभिचरति।

तद् न, नौस्थस्य नावि गच्छन्त्यां तटस्थेषु

अगतिषु नगेषु प्रतिकूलगतिदर्शनाद् दूरेषु चक्षुषाः

असन्निकृष्टेषु गच्छत्सु गत्यभावदर्शनात् ।

एवम् इह अपि अकर्मणि अहं करोमि इति कर्मदर्शनं कर्मणि च अकर्मदर्शनं विपरीतदर्शनं येन तन्निराकरणार्थम् उच्यते ‘कर्मणि अकर्म यः पश्येत्’ इत्यादि।

तद् एतद् उक्तप्रतिवचनम् अपि असकृद् अत्यन्तविपरीतदर्शनभाविततया मोमुह्यमानो लोकः श्रुतम् अपि असकृत् तत्त्वं विस्मृत्य मिथ्याप्रसङ्गम् अवतार्य अवतार्य चोदयति इति पुनः पुनः उत्तरम् आह भगवान् दुर्विज्ञेयत्वं च आलक्ष्य वस्तुनः ।

‘अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम्’ ‘न जायते म्रियते’

इत्यादिना आत्मनि कर्माभावः श्रुतिस्मृति-न्यायप्रसिद्ध उक्तो वक्ष्यमाणः च।

तस्मिन् आत्मनि कर्माभावे अकर्मणि

कर्मविपरीतदर्शनम् अत्यन्तनिरूढम् ।

यतः ‘किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।’

देहाद्याश्रयं कर्म आत्मनि अध्यारोप्य अहं कर्ता मम एतत् कर्म मया अस्य फलं भोक्तव्यम् इति च।

तथा अहं तूष्णीं भवामि येन अहं निरायासः अकर्मा सुखी स्याम् इति कार्यकरणाश्रय- व्यापारोपरमं तत्कृतं च सुखित्वम् आत्मनि अध्यारोप्य न करोमि किञ्चित् तूष्णीं सुखम् आसम् इति अभिमन्यते लोकः ।

तत्र इदं लोकस्य विपरीतदर्शनापनयनाय आह भगवान् ‘कर्मणि अकर्म यः पश्येत्’ इत्यादि।

अत्र च कर्म कर्म एव सत् कार्यकरणाश्रयं कर्मरहिते अविक्रिये आत्मनि सर्वैः अध्यस्तं यतः पण्डितः अपि अहं करोमि इति मन्यते।

अत आत्मसमवेततया सर्वलोकप्रसिद्धे कर्मणि नदीकूलस्थेषु इव वृक्षेषु गतिः प्रातिलोम्येन अकर्म कर्माभावं यथाभूतं गत्यभावम् इव वृक्षेषु यः पश्येत्,

अकर्मणि च कार्यकरणव्यापारोपरमे कर्मवद् आत्मनि अध्यारोपिते तूष्णीम् अकुर्वन् सुखम् आस इति अहङ्काराभिसन्धिहेतुत्वात् तस्मिन् अकर्मणि च कर्म यः पश्येत्।

य एवं कर्माकर्मविभागज्ञः स बुद्धिमान् पण्डितो मनुष्येषु स युक्तो योगी कृत्स्नकर्मकृत् च सः अशुभाद् मोक्षितः कृतकृत्यो भवति इत्यर्थः ।

अयं श्लोकः अन्यथा व्याख्यातः कैश्चित्, कथम्, नित्यानां किल कर्मणाम् ईश्वरार्थे अनुष्ठीयमानानां तत्फलाभावाद् अकर्माणि तानि उच्यन्ते गौण्या वृत्त्या। तेषां च अकरणम् अकर्म तत् च प्रत्यवायफलत्वात् कर्म उच्यते गौण्या एव वृत्त्या।

तत्र नित्ये कर्मणि अकर्म यः पश्येत् फला-भावात्, यथा धेनुः अपि गौः अगौः उच्यते क्षीराख्यं फलं न प्रयच्छति इति तद्वत्। तथा नित्याकरणे तु अकर्मणि च कर्म यः पश्येद् नरकादिप्रत्यवायफलं प्रयच्छति इति।

न एतद् युक्तं व्याख्यानम् एवं ज्ञानाद् अशुभाद्

मोक्षानुपपत्तेः यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।’ इति भगवता उक्तं वचनं बाध्येत।

कथम्, नित्यानाम् अनुष्ठानाद् अशुभात् स्याद् नाम मोक्षणं न तु तेषां फलाभावज्ञानात् । न हि नित्यानां फलाभावज्ञानम् अशुभमुक्तिफलत्वेन चोदितं नित्यकर्मज्ञानं वा । न च भगवता एव इह उक्तम् ।

एतेन अकर्मणि कर्मदर्शनं प्रत्युक्तम्। न हि

अकर्मणि कर्म इति दर्शनं कर्तव्यतया इह चोद्यते, नित्यस्य तु कर्तव्यतामात्रम् ।

न च अकरणाद् नित्यस्य प्रत्यवायो भवति इति विज्ञानात् किञ्चित् फलं स्यात्। न अपि नित्याकरणं ज्ञेयत्वेन चोदितम्।

न अपि कर्म अकर्म इति मिथ्यादर्शनाद्

अशुभाद् मोक्षणं बुद्धिमत्त्वं युक्तता कृत्स्नकर्म-कृत्त्वादि च फलम् उपपद्यते स्तुतिः वा ।

मिथ्याज्ञानम् एव हि साक्षाद् अशुभरूपं कुतः अन्यस्माद् अशुभाद् मोक्षणम्, न हि तमः तमसो निवर्तकं भवति।

ननु कर्मणि यद् अकर्मदर्शनम् अकर्मणि वा कर्मदर्शनं न तद् मिथ्याज्ञानं किं तर्हि गौणं फलभावाभावनिमित्तम् ।

न, कर्माकर्मविज्ञानाद् अपि गौणात् फलस्य अश्रवणात् । न अपि श्रुतहान्यश्रुतपरिकल्पनया कश्चिद् विशेषो लभ्यते ।

स्वशब्देन अपि शक्यं वक्तुं नित्यकर्मणां फलं न अस्ति अकरणात् च तेषां नरकपातः

स्याद् इति। तत्र व्याजेन परव्यामोहरूपेण कर्मणि अकर्म यः पश्येद् इत्यादिना किम्।

तत्र एवं व्याचक्षाणेन भगवता उक्तं वाक्यं

लोकव्यामोहार्थम् इति व्यक्तं कल्पितं स्यात् ।

न च एतत् छद्मरूपेण वाक्येन रक्षणीयं

वस्तु, न अपि शब्दान्तरेण पुनः पुनः उच्यमानं

सुबोध स्याद् इत्येवं वक्तुं युक्तम् ।

‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ इति अत्र हि स्फुटतर

उक्तः अर्थो न पुनः वक्तव्यो भवति।

सर्वत्र च प्रशस्तं बोद्धव्यं च कर्तव्यम् एव

न निष्प्रयोजनं बोद्धव्यम् इति उच्यते।

न च मिथ्याज्ञानं बोद्धव्यं भवति तत्प्रत्युपस्थापितं वा वस्त्वाभासम् ।

न अपि नित्यानाम् अकरणाद् अभावात् प्रत्यवायभावोत्पत्तिः ‘नासतो विद्यते भावः’ इति वचनात्। ‘कथमसतः सज्जायेत’ (छा० उ० ६। २। २) इति च दर्शितम्।

असतः सज्जन्मप्रतिषेधाद् असतः सदुत्पत्तिं ब्रुवता असद् एव सद् भवेत् सत् च असद् भवेद् इति उक्तं स्यात्। तत् च अयुक्तं सर्वप्रमाणविरोधात्।

न च निष्फलं विदध्यात् कर्म शास्त्रं दुःखस्वरूपत्वाद् दुःखस्य च बुद्धिपूर्वकतया कार्यत्वानुपपत्तेः ।

तदकरणे च नरकपाताभ्युपगमे अनर्थाय एव उभयथा अपि करणे अकरणे च शास्त्रं निष्फलं कल्पितं स्यात्।

स्वाभ्युपगमविरोधः च नित्यं निष्फलं कर्म इति अभ्युपगम्य मोक्षफलाय इति ब्रुवतः । तस्माद् यथाश्रुत एव अर्थः ‘कर्मणि अकर्म यः’ इत्यादेः, तथा च व्याख्यातः अस्माभिः श्लोकः ॥ १८ ॥

तद् एतत् कर्मणि अकर्मादिदर्शनं स्तूयते—