अध्याय 4 - श्लोक 19

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ १९ ॥

yasya sarve samārambhāḥ kāmasaṅkalpavarjitāḥ .
jñānāgnidagdhakarmāṇaṃ tamāhuḥ paṇḍitaṃ budhāḥ .. 19 ..


जिनका प्रारम्भ किया जाता है उनका नाम समारम्भ है, इस व्युत्पत्तिसे सम्पूर्ण कर्मोंका नाम समारम्भ है। उपर्युक्त प्रकारसे ‘कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म’ देखनेवाले जिस पुरुषके समस्त समारम्भ (कर्म) कामनासे और कामनाके कारणरूप संकल्पोंसे भी रहित हो जाते हैं अर्थात् जिसके द्वारा बिना ही किसी अपने प्रयोजनके—यदि वह प्रवृत्तिमार्गवाला है तो लोक-संग्रहके लिये और निवृत्तिमार्गवाला है तो जीवनयात्रा-निर्वाहके लिये—केवल चेष्टामात्र ही क्रिया होती है,

तथा कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनरूप ज्ञानाग्निसे जिसके पुण्य-पापरूप सम्पूर्ण कर्म दग्ध हो गये हैं, ऐसे ज्ञानाग्निदग्धकर्मा पुरुषको ब्रह्मवेत्ताजन वास्तवमें पण्डित कहते हैं ॥ १९ ॥

जो कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवाला है, वह यदि विवेक होनेसे पूर्व कर्मोंमें लगा हो तो भी कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मका ज्ञान हो जानेसे केवल जीवन-निर्वाहमात्रके लिये चेष्टा करता हुआ कर्मरहित संन्यासी ही हो जाता है, फिर उसकी कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं होती।

अर्थात् जो पहले कर्म करनेवाला हो और पीछे जिसको आत्माका सम्यक् ज्ञान हुआ हो, ऐसा पुरुष कर्मोंमें कोई प्रयोजन न देखकर साधनोंसहित कर्मोंका त्याग कर ही देता है।

परंतु किसी कारणसे कर्मोंका त्याग करना असम्भव होनेपर कोई ऐसा पुरुष यदि कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिरहित होकर केवल लोकसंग्रहके लिये पहलेके सदृश कर्म करता रहता है तो भी निजका प्रयोजन न रहनेके कारण (वास्तवमें) वह कुछ भी नहीं करता।

क्योंकि ज्ञानरूप अग्निद्वारा भस्मीभूत हो जानेके कारण उसके कर्म अकर्म ही हो जाते हैं। इसी आशयको दिखानेकी इच्छासे भगवान् कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

यस्य यथोक्तदर्शिनः सर्वे यावन्तः समारम्भाः कर्माणि समारभ्यन्ते इति समारम्भाः काम- सङ्कल्पवर्जिताः कामैः तत्कारणैः च सङ्कल्पैः वर्जिता मुधा एव चेष्टामात्रा अनुष्ठीयन्ते, प्रवृत्तेन चेत् लोकसङ्ग्रहार्थं निवृत्तेन चेत् जीवनमात्रार्थम्,

तं ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं कर्मादौ अकर्मादिदर्शनं ज्ञानं तद् एव अग्निः तेन ज्ञानाग्निना दग्धानि शुभाशुभलक्षणानि कर्माणि यस्य तम् आहुः परमार्थतः पण्डितं बुधा ब्रह्मविदः ॥ १९ ॥

यः तु अकर्मादिदर्शी सः अकर्मादिदर्शनाद् एव निष्कर्मा सन्न्यासी जीवनमात्रार्थचेष्टः सन् कर्मणि न प्रवर्तते यद्यपि प्राग् विवेकतः प्रवृत्तः ।

यः तु प्रारब्धकर्मा सन् उत्तरकालम् उत्पन्नात्मसम्यग्दर्शनः स्यात् स कर्मणि प्रयोजनम् अपश्यन् ससाधनं कर्म परित्यजति एव।

स कुतश्चित् निमित्तात् कर्मपरित्यागासम्भवे सति कर्मणि तत्फले च सङ्ग्रहिततया स्वप्रयोजनाभावात् लोकसङ्ग्रहार्थं पूर्ववत् कर्मणि प्रवृत्तः अपि न एव किञ्चित् करोति।

ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वात् तदीयं कर्म अकर्म एव सम्पद्यते इति एतम् अर्थं दर्शयिष्यन् आह—