अध्याय 4 - श्लोक 2

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ २ ॥

evaṃ paramparāprāptamimaṃ rājarṣayo viduḥ .
sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ parantapa .. 2 ..


इस प्रकार क्षत्रियोंकी परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको राजर्षियोंने—जो कि राजा और ऋषि दोनों थे—जाना।

हे परंतप! (अब) वह योग इस मनुष्यलोकमें बहुत कालसे नष्ट हो गया है। अर्थात् उसकी सम्प्रदाय-परम्परा टूट गयी है। अपने विपक्षियोंको पर कहते हैं, उन्हें जो शौर्यरूप तेजकी किरणोंके द्वारा सूर्यके समान तपता है वह परंतप यानी शत्रुओंको तपानेवाला कहा जाता है ॥ २ ॥

अजितेन्द्रिय और दुर्बल मनुष्योंके हाथमें पड़कर यह योग नष्ट हो गया है, यह देखकर और साथ ही लोगोंको पुरुषार्थरहित हुए देखकर—

तात्पर्य पढ़ें

एवं क्षत्रिय परम्परा प्राप्तम् इमं राजर्षयो राजानः

च ते ऋषयः च राजर्षयो विदुः इमं योगम्।

स योगः कालेन इह महता दीर्घेण नष्टो विच्छिन्नसम्प्रदायः संवृत्तो हे परन्तप, आत्मनो विपक्षभूताः पर उच्यन्ते तान् शौर्यतेजो-गभस्तिभिः भानुः इव तापयति इति परन्तपः शत्रुतापन इत्यर्थः ॥ २ ॥

दुर्बलान् अजितेन्द्रियान् प्राप्य नष्टं योगम्

इमम् उपलभ्य लोकं च अपुरुषार्थसम्बन्धिनम्—