कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥
tyaktvā karmaphalāsaṅgaṃ nityatṛpto nirāśrayaḥ .
karmaṇyabhipravṛtto’pi naiva kiñcitkaroti saḥ .. 20 ..
उपर्युक्त ज्ञानके प्रभावसे कर्मोंमें अभिमान और फलासक्तिका त्याग करके जो नित्यतृप्त है अर्थात् विषय-कामनासे रहित हो गया है,
तथा आश्रयसे रहित है। जिस फलका आश्रय लेकर मनुष्य पुरुषार्थ सिद्ध करनेकी इच्छा किया करता है, उसका नाम आश्रय है, ऐसे इस लोक और परलोकके इष्टफल-साधनरूप आश्रयसे जो रहित है,
उस ज्ञानीद्वारा किये हुए कर्म वास्तवमें अकर्म ही हैं; क्योंकि वह निष्क्रिय आत्माके ज्ञानसे सम्पन्न है।
अपना कोई प्रयोजन न रहनेके कारण ऐसे पुरुषको साधनोंसहित कर्मोंका परित्याग कर ही देना चाहिये, ऐसी कर्तव्यता प्राप्त होनेपर भी।
उन कर्मोंसे निवृत्त होना असम्भव होनेके कारण लोकसंग्रहकी इच्छासे या श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा की जानेवाली निन्दाको दूर करनेकी इच्छासे यदि (कोई ज्ञानी) पहलेकी तरह कर्मोंमें प्रवृत्त है तो भी वह निष्क्रिय आत्माके ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण वास्तवमें कुछ भी नहीं करता ॥ २० ॥
परंतु जो उससे विपरीत है अर्थात् उपर्युक्त प्रकारसे कर्म करनेवाला नहीं है, कर्मोंका आरम्भ करनेसे पहले (गृहस्थी न बनकर ब्रह्मचर्य आश्रममें) ही जिसका सबके अन्दर व्यापक अन्तरात्मारूप निष्क्रिय ब्रह्ममें आत्मभाव प्रत्यक्ष हो गया है,
वह केवल शरीरयात्राके लिये चेष्टा करनेवाला ज्ञान-निष्ठ यति, इस लोक और परलोकके समस्त इच्छित भोगोंकी आशासे रहित होनेके कारण, इस लोक और परलोकके भोगरूप फल देनेवाले कर्मोंमें अपना कोई भी प्रयोजन न देखकर कर्मोंको और कर्मोंके साधनों को त्यागकर मुक्त हो जाता है। इसी भावको दिखलानेके लिये (अगला श्लोक) कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
त्यक्त्वा कर्मसु अभिमानं फलासङ्गं च यथोक्तेन ज्ञानेन नित्यतृप्तो निराकाङ्क्षो विषयेषु इत्यर्थः ।
निराश्रय आश्रयरहितः। आश्रयो नाम यदाश्रित्य पुरुषार्थं सिसाधयिषति, दृष्टादृष्टेष्ट-फलसाधनाश्रयरहित इत्यर्थः।
विदुषा क्रियमाणं कर्म परमार्थतः अकर्म एव तस्य निष्क्रियात्मदर्शनसम्पन्नत्वात् ।
तेन एवं भूतेन प्रयोजनाभावात् ससाधनं कर्म परित्यक्तव्यम् एव इति प्राप्ते ।
ततो निर्गमासम्भवात् लोकसङ्ग्रहचिकीर्षया शिष्टविगर्हणापरिजिहीर्षया वा पूर्ववत् कर्मणि अभिप्रवृत्तः अपि निष्क्रियात्मदर्शनसम्पन्नत्वाद् न एव किञ्चित् करोति सः ॥ २० ॥
यः पुनः पूर्वोक्तविपरीतः प्राग् एव कर्मा- रम्भाद् ब्रह्मणि सर्वान्तरे प्रत्यगात्मनि निष्क्रिये सञ्जातात्मदर्शनः,
स दृष्टादृष्टेष्टविषयाशीर्विवर्जिततया दृष्टादृष्टार्थे कर्मणि प्रयोजनम् अपश्यन् ससाधनं कर्म सन्न्यस्य शरीरयात्रामात्रचेष्टो यतिः ज्ञाननिष्ठो मुच्यते इति एतम् अर्थं दर्शयितुम् आह—