त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥
nirāśīryatacittātmā
tyaktasarvaparigrahaḥ .
śārīraṃ kevalaṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam .. 21 ..
जिसकी सम्पूर्ण आशाएँ दूर हो गयी हैं, वह ‘निराशीः’ है, जिसने चित्त यानी अन्तःकरण को और आत्मा यानी बाह्य कार्य-करणके संघातरूप शरीर को— इन दोनोंको भली प्रकार अपने वश में कर लिया है वह ‘यतचित्तात्मा’ कहलाता है, जिसने समस्त परिग्रह का अर्थात् भोगोंकी सामग्री का सर्वथा त्याग कर दिया है, वह ‘त्यक्तसर्वपरिग्रह’ है।
ऐसा पुरुष केवल शरीरस्थितिमात्र के लिये किये जानेवाले और अभिमानरहित कर्मोंको करता हुआ पापको अर्थात् अनिष्टरूप पुण्य-पाप दोनोंको नहीं प्राप्त होता। बन्धनकारक होनेसे धर्म भी मुमुक्षु के लिये तो पाप ही है।
यहाँ ‘शारीरं केवलं कर्म’ इस पदमें शरीरद्वारा होनेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने गये हैं, या शरीर-निर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने गये हैं ?
चाहे शरीरद्वारा होनेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने जायँ या शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म ‘शारीरिक कर्म’ माने जायँ, इस विवेचनसे क्या प्रयोजन है ? इसपर कहते हैं—
जो शरीरद्वारा होनेवाले कर्मोंका नाम शारीरिक कर्म मान लिया जाय तो इस लोकमें या परलोकमें फल देनेवाले निषिद्ध कर्मोंको भी शरीरद्वारा करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता, ऐसा कहनेसे भगवान् के कथनमें विरुद्ध विधानका दोष आता है। और इस लोक या परलोकमें फल देनेवाले, शास्त्रविहित कर्मोंको शरीरद्वारा करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता, ऐसा कहनेसे भी बिना प्राप्त हुए दोष के प्रतिषेध करनेका प्रसङ्ग आ जाता है।
तथा ‘शारीरिक कर्म करता हुआ’ इस विशेषणसे और ‘केवल’ शब्दके प्रयोगसे (उपर्युक्त मान्यताके अनुसार) भगवान्का यह कहना हो जाता है कि (शरीरके सिवा) मन-वाणीद्वारा किये जानेवाले विहित और प्रतिषिद्ध कर्मोंको, जो कि धर्म और अधर्म नाम से कहे जाते हैं, करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त होता है।
उसमें भी ‘मन-वाणीद्वारा विहित कर्मोंको करता हुआ पापको प्राप्त होता है,’ यह कहना तो विरुद्ध विधान होगा, और ‘निषिद्ध कर्मोंको करता हुआ पापको प्राप्त होता है,’ यह कहना अनुवादमात्र होनेसे व्यर्थ होगा।
परंतु जब शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म शारीरिक कर्म मान लिये जायँगे, तब इसका यह अर्थ हो जायगा कि इस लोक या परलोकके भोग ही जिनका प्रयोजन है, जो विधि-निषेधात्मक शास्त्रोंद्वारा जाने जाते हैं, जो शरीर, मन या वाणीद्वारा किये जाते हैं, ऐसे अन्य कर्मोंको न करता हुआ उन शरीर, मन या वाणीसे केवल शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक कर्म लोकदृष्टिसे करता हुआ पुरुष किल्बिषको प्राप्त नहीं होता। यहाँ ‘केवल’ शब्दके प्रयोगसे यह अभिप्राय है कि वह ‘मैं करता हूँ’ इस अभिमान से रहित होकर केवल लोकदृष्टिसे ही शरीर, वाणी आदिकी चेष्टामात्र करता है।
ऐसे पुरुषको पापरूप किल्बिष प्राप्त होना तो असम्भव है, इसलिये यहाँ यह समझना चाहिये कि वह किल्बिषको यानी संसारको प्राप्त नहीं होता।
ज्ञानरूप अग्नि द्वारा उसके समस्त कर्मोंका नाश हो जानेके कारण वह बिना किसी प्रतिबन्धके मुक्त ही हो जाता है।
यह पहले कहे हुए यथार्थ आत्मज्ञानके फल का अनुवादमात्र है। ‘शारीरं केवलं कर्म’ इस वाक्य का इस प्रकार अर्थ मान लेनेसे वह अर्थ निर्दोष सिद्ध होता है ॥ २१ ॥
जिसने समस्त संग्रह का त्याग कर दिया है, ऐसे संन्यासीके पास शरीरनिर्वाहके कारणरूप अन्नादिका संग्रह नहीं होता, इसलिये उसको याचनादिद्वारा शरीरनिर्वाह करनेकी योग्यता प्राप्त हुई। इसपर ‘बिना याचना किये’, ‘बिना संकल्पके अथवा बिना इच्छा किये प्राप्त हुए’ इत्यादि वचनोंसे जो शास्त्रमें संन्यासीके शरीरनिर्वाहके लिये अन्नादि की प्राप्तिके द्वार बतलाये गये हैं, उनको प्रकट करते हुए कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
निराशी: निर्गता आशिषो यस्मात् स निराशी: यतचित्तात्मा चित्तम् अन्तःकरणम् आत्मा बाह्यः कार्यकरणसङ्घातः तौ उभौ अपि यतौ संयतौ येन स यतचित्तात्मा, त्यक्तसर्वपरिग्रहः त्यक्तः सर्वः परिग्रहो येन स त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं केवलं तत्र अपि अभिमानवर्धितं कर्म कुर्वन् न आप्नोति न प्राप्नोति किल्बिषम् अनिष्टरूपं पापं धर्मं च । धर्मः अपि मुमुक्षोः किल्बिषम् एव बन्धापादकत्वात् ।
किं च शारीरं केवलं कर्म इत्यत्र किं शरीरनिर्वर्त्यं शारीरं कर्म अभिप्रेतम् आहोस्वित् शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरं कर्म इति।
किं च अतो यदि शरीरनिर्वर्त्यं शारीरं कर्म यदि वा शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरम् इति, उच्यते—
यदा शरीरनिर्वर्त्यं कर्म शारीरम् अभिप्रेतं स्यात् तदा दृष्टादृष्टप्रयोजनं कर्म प्रतिषिद्धम् अपि शरीरेण कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम् इति ब्रुवतो विरुद्धाभिधानं प्रसज्येत । शास्त्रीयं च कर्म दृष्टादृष्टप्रयोजनं शरीरेण कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम् इति अपि ब्रुवतः अप्राप्तप्रतिषेधप्रसङ्गः ।
शारीरं कर्म कुर्वन् इति विशेषणात् केवलशब्दप्रयोगात् च वाङ्मनसनिर्वर्त्यं कर्म विधिप्रतिषेधविषयं धर्माधर्मशब्दवाच्यं कुर्वन् प्राप्नोति किल्बिषम् इति उक्तं स्यात्।
तत्र अपि वाङ्मनसाभ्यां विहितानुष्ठानपक्षे किल्बिषप्राप्तिवचनं विरुद्धम् आपद्येत। प्रतिषिद्धसेवापक्षे अपि भूतार्थानुवादमात्रम् अनर्थकं स्यात्।
यदा तु शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरं कर्म अभिप्रेतं भवेत् तदा दृष्टादृष्टप्रयोजनं कर्म विधिप्रतिषेधगम्यं शरीरवाङ्मनसनिर्वर्त्यम् अन्यद् अकुर्वन् तैः एव शरीरादिभिः शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं केवलशब्दप्रयोगाद् अहं करोमि इति अभिमानवर्जितः शरीरादिचेष्टामात्रं लोकदृष्ट्या कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम् ।
एवम्भूतस्य पापशब्दवाच्यकिल्बिषप्राप्त्य-
सम्भवात् किल्बिषं संसारं न आप्नोति।
ज्ञानाग्रिदग्धसर्वकर्मत्वाद् अप्रतिबन्धेन
मुच्यते एव इति।
पूर्वोक्तसम्यग्दर्शनफलानुवाद एव एषः । एवम्
‘शारीरं केवलं कर्म’ इति अस्य अर्थपरिग्रहे
निरवद्यं भवति ॥ २१ ॥
त्यक्तसर्वपरिग्रहस्य यतेः अन्नादेः शरीर-स्थितिहेतोः परिग्रहस्य अभावाद् याचनादिना शरीरस्थितौ कर्तव्यतायां प्राप्तायाम् अयाचित-मसङ्क्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया’ (बोधा० स्मृ० २१।८।१२) इत्यादिना वचनेन अनुज्ञातं यतेः शरीर-स्थितिहेतोः अन्नादेः प्राप्तिद्वारम् आविष्कुर्वन् आह—