समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥
yadṛcchālābhasantuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ .
samaḥ siddhāvasiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate .. 22 ..
जो बिना माँगे अपने-आप मिले हुए पदार्थसे संतुष्ट है अर्थात् उसीमें जिसके मनका यह भाव हो जाता है कि यही पर्याप्त है,
जो द्वन्द्वोंसे अतीत है अर्थात् शीत–उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे सताये जानेपर भी जिसके चित्तमें विषाद नहीं होता,
जो ईर्ष्यासे रहित अर्थात् निर्वैर-बुद्धिवाला है और जो अपने-आप प्राप्त हुए लाभकी सिद्धि-असिद्धिमें भी सम रहता है,
जो ऐसा शरीरस्थितिके हेतुरूप अन्नादिके प्राप्त होने या न होनेमें भी हर्ष-शोकसे रहित, समदर्शी है और कर्मादिमें अकर्मादि देखनेवाला, यथार्थ आत्म-दर्शननिष्ठ एवं शरीरस्थितिमात्रके लिये किये जानेवाले
और शरीरादिद्वारा होनेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंमें भी मैं कुछ नहीं करता ‘गुण ही गुणोंमें बर्त रहे हैं’ इस प्रकार सदा देखनेवाला है वह यति अपनेमें कर्तापनका अभाव देखनेसे अर्थात् आत्माको अकर्ता समझ लेनेसे वास्तवमें भिक्षाटनादि कुछ भी कर्म नहीं करता है।
ऐसा पुरुष लोकव्यवहारकी साधारण दृष्टिसे तो सांसारिक पुरुषोंद्वारा आरोपित किये हुए कर्तापनके कारण भिक्षाटनादि कर्मोंका कर्ता होता है। परंतु शास्त्रप्रमाण आदिसे उत्पन्न अपने अनुभवसे (वस्तुतः) वह अकर्ता ही रहता है।
इस प्रकार दूसरोंद्वारा जिसपर कर्तापनका अध्यारोप किया गया है, ऐसा वह पुरुष शरीर-निर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंको करता हुआ भी नहीं बँधता; क्योंकि ज्ञानरूप अग्निद्वारा उसके (समस्त) बन्धनकारक कर्म हेतुसहित भस्म हो चुके हैं। यह पहले कहे हुएका ही अनुवादमात्र है ॥ २२ ॥
जो कर्म करना प्रारम्भ कर चुका है, ऐसा पुरुष जब कर्म करते-करते इस ज्ञानसे सम्पन्न हो जाता है कि ‘निष्क्रिय ब्रह्म ही आत्मा है’ तब अपने कर्ता, कर्म और प्रयोजनादिका अभाव देखनेवाले उस पुरुषके लिये कर्मोंका त्याग कर देना ही उचित होता है। किंतु किसी कारणवश कर्मोंका त्याग करना असम्भव होनेपर यदि वह पहलेकी तरह उन कर्मोंमें लगा रहे तो भी, वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। इस प्रकार ‘त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्’ इस श्लोकसे (ज्ञानीके) कर्मोंका अभाव (अकर्मत्व) दिखलाया जा चुका है। जिस पुरुषके कर्मोंका इस प्रकार अभाव दिखाया गया है, उसीके (विषयमें अगला श्लोक कहते हैं)—
तात्पर्य पढ़ें
यदृच्छालाभसन्तुष्टः अप्रार्थितोपनतो लाभो
यदृच्छालाभः तेन सन्तुष्टः सञ्जातालम्प्रत्ययः ।
द्वन्द्वातीतो द्वन्द्वः शीतोष्णादिभिः हन्यमानः अपि अविषण्णचित्तो द्वन्द्वातीत उच्यते।
विमत्सरो विगतमत्सरो निर्वैरबुद्धिः समः
तुल्यो यदृच्छालाभस्य सिद्धौ असिद्धौ च ।
य एवम्भूतो यतिः अन्नादेः शरीरस्थितिहेतोः
लाभालाभयोः समो हर्षविषादवर्जितः कर्मादौ
अकर्मादिदर्शी यथाभूतात्मदर्शननिष्ठः शरीर-
स्थितिमात्रप्रयोजने भिक्षाटनादिकर्मणि शरीरादि-निर्वर्त्ये न एव किञ्चित् करोमि अहम् गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ इति एवं सदा सम्परिचक्षाण आत्मनः कर्तृत्वाभावं पश्यन् न एव किञ्चिद् भिक्षाटनादिकं कर्म करोति।
लोकव्यवहारसामान्यदर्शनेन तु लौकिकैः आरोपितकर्तृत्वे भिक्षाटनादौ कर्मणि कर्ता भवति स्वानुभवेन तु शास्त्रप्रमाणादिजनितेन अकर्ता एव।
स एवं पराध्यारोपितकर्तृत्वः शरीरस्थिति-मात्रप्रयोजनं भिक्षाटनादिकं कर्म कृत्वा अपि न निबध्यते, बन्धहेतोः कर्मणः सहेतुकस्य ज्ञानाग्निना दग्धत्वाद् इति उक्तानुवाद एव एषः ॥ २२ ॥
‘त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्’ इति अनेन श्लोकेन यः प्रारब्धकर्मा सन् यदा निष्क्रियब्रह्मात्मदर्शन-सम्पन्नः स्यात् तदा तस्य आत्मनः कर्तृकर्म-प्रयोजनाभावदर्शिनः कर्मपरित्यागे प्राप्ते कुतश्चिद् निमित्तात् तदसम्भवे सति पूर्ववत् तस्मिन् कर्मणि अभिप्रवृत्तः अपि न एव किञ्चित् करोति स इति कर्माभावः प्रदर्शितः । यस्य एवं कर्माभावो दर्शितः तस्य एव—