संशितव्रताः ॥ २८ ॥
dravyayajñāstapoyajñā yogayajñāstathāpare .
saṃśitavratāḥ .. 28 ..
जो यज्ञबुद्धि से तीर्थादि में द्रव्य लगाते हैं वे द्रव्ययज्ञा यानी द्रव्य-सम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं।
जो तपस्वी हैं वे तपोयज्ञा यानी तपरूप यज्ञ करनेवाले हैं। प्राणायाम-प्रत्याहाररूप योग ही जिनका यज्ञ है वे योगयज्ञा यानी योगरूप यज्ञ करनेवाले हैं।
वैसे ही अन्य कई स्वाध्याययज्ञ और ज्ञानयज्ञ करनेवाले भी हैं। जिनका यथाविधि ऋग्वेद आदिका अभ्यासरूप स्वाध्याय ही यज्ञ है, वे स्वाध्याययज्ञ करनेवाले हैं और शास्त्रों का अर्थ जाननारूप ज्ञान जिनका यज्ञ है वे ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं।
इसी तरह कई यज्ञशील संशित व्रतवाले हैं। जिनके व्रत-नियम अच्छी प्रकार तीक्ष्ण किये हुए यानी सूक्ष्म-शुद्ध किये हुए होते हैं वे पुरुष संशितव्रत कहलाते हैं ॥ २८ ॥
तथा—
तात्पर्य पढ़ें
द्रव्ययज्ञाः तीर्थेषु द्रव्यविनियोगं यज्ञबुद्ध्या कुर्वन्ति ये ते द्रव्ययज्ञाः।
तपोयज्ञा ये तपस्विनः ते तपोयज्ञाः, योगयज्ञाः प्राणायामप्रत्याहारादिलक्षणो योगो यज्ञो येषां ते योगयज्ञाः।
तथा अपरे स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः च स्वाध्यायो यथाविधि ऋगाद्यभ्यासो यज्ञो येषां ते स्वाध्याययज्ञा ज्ञानयज्ञा ज्ञानं शास्त्रार्थपरिज्ञानं यज्ञो येषां ते ज्ञानयज्ञाः च।
यतयो यतनशीलाः संशितव्रताः सम्यक्शितानि तनूकृतानि तीक्ष्णीकृतानि व्रतानि येषां ते संशितव्रताः ॥ २८ ॥