अध्याय 4 - श्लोक 30

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥

apare niyatāhārāḥ prāṇānprāṇeṣu juhvati.
sarve’pyete yajñavido yajñakṣapitakalmaṣāḥ .. 30 ..


अन्य कितने ही नियताहारी अर्थात् जिनका आहार नियमित किया हुआ है ऐसे परिमित भोजन करनेवाले प्राणों को यानी वायुके भिन्न-भिन्न भेदोंको प्राणों में ही हवन किया करते हैं।

भाव यह है कि वे जिस-जिस वायु को जीत लेते हैं उसीमें वायुके दूसरे भेदोंको हवन कर देते हैं यानी वे सब वायु-भेद उसमें विलीन-से हो जाते हैं।

ये सभी पुरुष यज्ञों को जाननेवाले और यज्ञों द्वारा निष्पाप हो गये होते हैं अर्थात् उपर्युक्त यज्ञों द्वारा जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, वे ‘यज्ञक्षपितकल्मष’ कहलाते हैं ॥ ३० ॥

इस प्रकार उपर्युक्त यज्ञों का सम्पादन करके—

तात्पर्य पढ़ें

अपरे नियताहारा नियतः परिमित आहारो येषां ते नियताहाराः सन्तः, प्राणान् वायुभेदान् प्राणेषु एव जुह्वति

यस्य यस्य वायोः जयः क्रियते इतरान् वायुभेदान् तस्मिन् तस्मिन् जुह्वति ते तत्र प्रविष्टा इव भवन्ति।

सर्वे अपि एते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः यज्ञैः यथोक्तैः क्षपितो नाशितः कल्मषो येषां ते यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥

एवं यथोक्तान् यज्ञान् निर्वर्त्य—