अध्याय 4 - श्लोक 31

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥

yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam .
nāyaṃ loko’styayajñasya kuto’nyaḥ kurusattama .. 31 ..


यज्ञों के शेष का नाम यज्ञशिष्ट है, वही अमृत है उसको जो भोगते हैं, वे यज्ञशिष्ट अमृतभोजी हैं। उपर्युक्त यज्ञों को करके उससे बचे हुए समय द्वारा यथाविधि प्राप्त अमृतरूप विहित अन्न को भक्षण करनेवाले यज्ञशिष्ट अमृतभोजी पुरुष, सनातन यानी चिरन्तन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

यहाँ यान्ति इस गतिविषयक शब्द की शक्ति से यह पाया जाता है कि यदि यज्ञ करनेवाले मुमुक्षु होते हैं तो कालातिक्रम की अपेक्षा से (मरने के बाद कितने ही काल तक ब्रह्मलोक में रहकर फिर प्रलय के समय ब्रह्म को प्राप्त होते हैं)।

हे कुरुश्रेष्ठ ! जो मनुष्य उपर्युक्त यज्ञों में से एक भी यज्ञ नहीं करता, उस यज्ञरहित पुरुष को, सब प्राणियों के लिये जो साधारण है, ऐसा यह लोक भी नहीं मिलता, फिर विशेष साधनों द्वारा प्राप्त होनेवाला अन्य लोक तो मिल ही कैसे सकता है ? ॥ ३१ ॥

तात्पर्य पढ़ें

यज्ञशिष्टामृतभुजो यज्ञानां शिष्टं यज्ञशिष्टं च तद् अमृतं च यज्ञशिष्टामृतं तद् भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजो यथोक्तान् यज्ञान् कृत्वा तच्छिष्टेन कालेन यथाविधि चोदितम् अन्नम् अमृताख्यं भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति गच्छन्ति ब्रह्म सनातनं चिरन्तनम् ।

मुमुक्षवः चेत् कालातिक्रमापेक्षया इति

सामर्थ्याद् गम्यते ।

न अयं लोकः सर्वप्राणिसाधारणः अपि अस्ति यथोक्तानां यज्ञानाम् एकः अपि यज्ञो यस्य न अस्ति स अयज्ञः तस्य कुतः अन्यो विशिष्टसाधनसाध्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥