सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥
śreyāndravyamayādyajñājjñānayajñaḥ parantapa .
sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyate .. 33 ..
हे परन्तप ! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा अर्थात् द्रव्यरूप साधनद्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठतर है।
क्योंकि द्रव्यमय यज्ञ फल का आरम्भ करनेवाला है और ज्ञानयज्ञ (जन्मादि) फल देनेवाला नहीं है। इसलिये वह श्रेष्ठतर अर्थात अधिक प्रशंसनीय है।
क्योंकि हे पार्थ ! सब के सब कर्म मोक्षसाधनरूप ज्ञानमें, जो कि सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके समान है, समाप्त हो जाते हैं अर्थात् उन सबका ज्ञानमें अन्तर्भाव हो जाता है।
‘जैसे ( चौपड़ के खेलमें कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग ऐसे नामवाले जो चार पासे होते हैं उनमेंसे ) कृतयुग नामक पासे को जीत लेनेपर नीचेवाले सब पासे अपने-आप ही जीत लिये जाते हैं, ऐसे ही जिसको वह रैक्व जानता है उस ब्रह्म को जो कोई भी जान लेता है, प्रजा जो कुछ भी अच्छे कर्म करती है उन सबका फल उसे अपने-आप ही मिल जाता है।’ इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है ॥ ३३ ॥
इस प्रकार से श्रेष्ठ बतलाया हुआ वह ज्ञान किस उपायसे मिलता है ? सो कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
श्रेयान् द्रव्यमयाद् द्रव्यसाधनसाध्याद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञो हे परन्तप।
द्रव्यमयो हि यज्ञः फलस्य आरम्भको ज्ञानयज्ञो न फलारम्भकः अतः श्रेयान् प्रशस्यतरः।
कथं यतः सर्वं कर्म समस्तम् अखिलम् अप्रतिबद्धं पार्थ ज्ञाने मोक्षसाधने सर्वतःसम्प्लुतोदक-स्थानीये परिसमाप्यते अन्तर्भवति इत्यर्थः ।
‘यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किं च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद’ (छा० उ० ४। १। ४) इति श्रुतेः ॥ ३३ ॥
तद् एतद् विशिष्टं ज्ञानं तर्हि केन प्राप्यते इति उच्यते—