उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥
tadviddhi praṇipātena paripraśnena sevayā .
upadekṣyanti te jñānaṃ jñāninastattvadarśinaḥ .. 34 ..
वह ज्ञान जिस विधि से प्राप्त होता है वह तू जान यानी सुन ! आचार्य के समीप जाकर भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करने से एवं ‘किस तरह बन्धन हुआ ?’ ‘कैसे मुक्ति होगी ?’ ‘विद्या क्या है ?’ ‘अविद्या क्या है ?’ इस प्रकार ( निष्कपट भाव से ) प्रश्न करने से और गुरु की यथायोग्य सेवा करने से ( वह ज्ञान प्राप्त होता है ) ।
अभिप्राय यह कि इस प्रकार सेवा और विनय आदि से प्रसन्न हुए तत्त्वदर्शी ज्ञानी आचार्य तुझे उपर्युक्त विशेषणों वाले ज्ञान का उपदेश करेंगे।
ज्ञानवान् भी कोई-कोई ही यथार्थ तत्त्व को जानने वाले होते हैं, सब नहीं होते। इसलिये ज्ञानी के साथ ‘तत्त्वदर्शी’ यह विशेषण लगाया है।
इससे भगवान् का यह अभिप्राय है कि जो यथार्थ तत्त्व को जानने वाले होते हैं, उनके द्वारा उपदेश किया हुआ ही ज्ञान अपने कार्य को सिद्ध करने में समर्थ होता है दूसरा नहीं ॥ ३४ ॥
ऐसा होने पर यह कहना भी ठीक है—
तात्पर्य पढ़ें
तद् विद्धि विजानीहि येन विधिना प्राप्ते इति आचार्यान् अभिगम्य प्रणिपातेन प्रकर्षेण नीचैः पतनं प्रणिपातो दीर्घनमस्कारः तेन कथं बन्धः कथं मोक्षः का विद्या का च अविद्या इति परिप्रश्नेन सेवया गुरुशुश्रूषया ।
एवम् आदिना प्रश्नेन आवर्जिता आचार्या उपदेक्ष्यन्ति कथयिष्यन्ति ते ज्ञानं यथोक्त-विशेषणम्, ज्ञानिनः ।
ज्ञानवन्तः अपि केचिद् यथावत् तत्त्व-दर्शनशीला अपरे न अतो विशिनष्टि तत्त्वदर्शिन इति।
ये सम्यग्दर्शिनः तैः उपदिष्टं ज्ञानं कार्यक्षमं
भवति न इतरद् इति भगवतो मतम् ॥ ३४ ॥
तथा च सति इदम् अपि समर्थं वचनम्—