न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥
na hi jñānena sadṛśaṃ pavitramiha vidyate.
tatsvayaṃ yogasaṃsiddhaḥ kālenātmani vindati .. 38 ..
ज्ञान के समान पवित्र करनेवाला—शुद्ध करनेवाला इस लोक में (दूसरा कोई) नहीं है।
कर्मयोग या समाधियोग द्वारा बहुत काल में भली प्रकार शुद्धान्त:करण हुआ अर्थात् वैसी योग्यता को प्राप्त हुआ मुमुक्षु स्वयं अपने आत्मा में ही उस ज्ञान को पाता है यानी साक्षात् किया करता है ॥ ३८ ॥
जिसके द्वारा निश्चय ही ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है वह उपाय बतलाया जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
न हि ज्ञानेन सदृशं तुल्यं पवित्रं पावनं शुद्धिकरम् इह विद्यते।
तद् ज्ञानं स्वयम् एव योगसंसिद्धो योगेन कर्मयोगेन समाधियोगेन च संसिद्धः संस्कृतो योग्यताम् आपन्नो मुमुक्षुः कालेन महता आत्मनि विन्दति लभते इत्यर्थः ॥ ३८ ॥
येन एकान्तेन ज्ञानप्राप्तिः भवति स उपाय उपदिश्यते—