नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥
ajñaścāśraddadhānaśca saṃśayātmā vinaśyati .
nāyaṃ loko’sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ .. 40 ..
जो अज्ञ यानी आत्मज्ञानसे रहित है, जो अश्रद्धालु है और जो संशयात्मा है—ये तीनों नष्ट हो जाते हैं।
यद्यपि अज्ञानी और अश्रद्धालु भी नष्ट होते हैं; परंतु जैसा संशयात्मा नष्ट होता है, वैसे नहीं, क्योंकि इन सबमें संशयात्मा अधिक पापी है।
अधिक पापी कैसे है ? (सो कहते हैं) संशयात्मा को अर्थात् जिसके चित्त में संशय है उस पुरुष को न तो यह साधारण मनुष्यलोक मिलता है, न परलोक मिलता है और न सुख ही मिलता है, क्योंकि वहाँ भी संशय होना सम्भव है, इसलिये संशय नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥
कैसे ?
तात्पर्य पढ़ें
अज्ञः च अनात्मज्ञः अश्रद्धानः च संशयात्मा च विनश्यति ।
अज्ञाश्रद्धानौ यद्यपि विनश्यतः तथापि न तथा यथा संशयात्मा, संशयात्मा तु पापिष्ठः सर्वेषाम् ।
कथम्, न अयं साधारणः अपि लोकः अस्ति तथा न परो लोको न सुखम्, तत्र अपि संशयोपपत्तेः संशयात्मनः संशयचित्तस्य । तस्मात् संशयो न कर्तव्यः ॥ ४० ॥
कस्मात्—