ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥ ४१ ॥
yogasannyastakarmāṇāṃ
jñānasañchinnasaṃśayam .
ātmavantaṃ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya .. 41 ..
जिस परमार्थदर्शी पुरुष ने परमार्थज्ञानरूप योग के द्वारा पुण्य-पापरूप सम्पूर्ण कर्मों का त्याग कर दिया हो, वह योगसंन्यस्तकर्मा है । ( उसको कर्म नहीं बाँधते ।)
वह योगसंन्यस्तकर्मा कैसे है? सो कहते हैं—
आत्मा और ईश्वर की एकता-दर्शनरूप ज्ञान द्वारा जिसका संशय अच्छी प्रकार नष्ट हो चुका है, वह ‘ज्ञानसंछिन्नसंशय’ कहलाता है। (इसीलिये वह योगसंन्यस्तकर्मा है।)
जो इस प्रकार योगसंन्यस्तकर्मा है, उस आत्मवान् यानी आत्मबल से युक्त प्रमादरहित पुरुष को हे धनंजय! (गुण ही गुणों में बर्तते हैं इस प्रकार) गुणों की चेष्टामात्र के रूप में समझे हुए कर्म नहीं बाँधते, अर्थात् इष्ट, अनिष्ट और मिश्र—इन तीन प्रकार के फलों का भोग नहीं करा सकते ॥ ४१ ॥
क्योंकि कर्मयोग का अनुष्ठान करने से अन्तःकरण की अशुद्धिका क्षय हो जाने पर उत्पन्न होने वाले आत्मज्ञान से जिसका संशय नष्ट हो गया है ऐसा पुरुष तो ज्ञानाग्नि द्वारा उसके कर्म दग्ध हो जाने के कारण कर्मों से नहीं बँधता; तथा ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुष्ठान में संशय रखने वाला नष्ट हो जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
योगसन्न्यस्तकर्माणं परमार्थदर्शनलक्षणेन योगेन सन्न्यस्तानि कर्माणि येन परमार्थदर्शिना धर्माधर्माख्यानि तं योगसन्न्यस्तकर्माणम् ।
कथं योगसन्न्यस्तकर्मा इति आह—
ज्ञानेन आत्मेश्वरैकत्वदर्शनलक्षणेन सञ्छिन्नः
संशयो यस्य स ज्ञानसञ्छिन्नसंशयः ।
य एवं योगसन्न्यस्तकर्मा तम् आत्मवन्तम् अप्रमत्तं गुणचेष्टारूपेण दृष्टानि कर्माणि न निबध्नन्ति अनिष्टादिरूपं फलं न आरभन्ते हे धनञ्जय ॥ ४१ ॥
यस्मात् कर्मयोगानुष्ठानाद् अशुद्धिक्षय- हेतुकज्ञानसञ्छिन्नसंशयो न निबध्यते, कर्मभिः ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वाद् एव। यस्मात् च ज्ञानकर्मानुष्ठानविषये संशयवान् विनश्यति—