अध्याय 4 - श्लोक 42

तस्मादज्ञानसम्भूतं
हत्स्थं
ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥

tasmādajñānasambhūtaṃ
hatsthaṃ
jñānāsinātmanaḥ .
chittvainaṃ saṃśayaṃ yogamātiṣṭhottiṣṭha bhārata .. 42 ..


क्योंकि एक का संशय दूसरे के द्वारा छेदन करने की शङ्का यहाँ प्राप्त नहीं होती जिससे कि (ऐसी शङ्का को दूर करने के उद्देश्य से) ‘आत्मनः’ विशेषण दिया जावे, अतः (यही समझना चाहिये कि) आत्मविषयक होने से भी अपना कहा जा सकता है। (सुतरां संशय को ‘अपना’ बतलाना असंगत नहीं है।)

अतः अपने नाश के कारणरूप इस संशय को (उपर्युक्त प्रकार से) काटकर पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति के उपायरूप कर्मयोग में स्थित हो और हे भारत! अब युद्ध के लिये खड़ा हो जा ॥ ४२ ॥

इसलिये अज्ञान यानी अविवेक से उत्पन्न और अन्तःकरण में रहनेवाले (अपने नाशक के हेतुभूत) इस अत्यन्त पापी अपने संशय को ज्ञानखड्ग द्वारा अर्थात् शोक-मोह आदि दोनों का नाश करनेवाला यथार्थ दर्शनरूप जो ज्ञान है वही खड्ग है उस स्वरूपज्ञानरूप खड्ग द्वारा (छेदन करके कर्मयोग में स्थित हो)।

यहाँ संशय आत्मविषयक है इसलिये (उसके साथ ‘आत्मनः’ विशेषण दिया गया है)।

‘कर्मण्यकर्म यः पश्येत्’ इस पद से लेकर ‘स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्’ ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्’ ‘शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्’ ‘यदृच्छालाभसन्तुष्टः’ ‘ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः’ ‘कर्मजान्विद्धि तान्सर्वान्’ ‘सर्वं कर्माखिलं पार्थ’ ‘ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि’ ‘योगसंन्यस्तकर्माणम्’ यहाँ तक के वचनों से भगवान् ने सब कर्मों के संन्यास का वर्णन किया।

तथा ‘छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठ’ इस वचन से यह भी कहा कि कर्मानुष्ठानरूप योग में स्थित हो अर्थात् कर्म कर।

उन दोनों का, अर्थात् कर्मयोग और कर्मसंन्यास का, स्थिति और गति की भाँति परस्पर विरोध होने के कारण, एक पुरुष द्वारा एक साथ (उनका) अनुष्ठान किया जाना असम्भव है और काल के भेद से अनुष्ठान करने का विधान नहीं है, इसलिये स्वभाव से ही इन दोनों में से किसी एक की ही कर्तव्यता प्राप्त होती है, अतएव कर्मयोग और कर्मसंन्यास—इन दोनों में जो श्रेष्ठतर हो, वही करना चाहिये दूसरा नहीं, ऐसा मानता हुआ अर्जुन, दोनों में से श्रेष्ठतर साधन पूछने की इच्छा से ‘संन्यासं कर्मणां कृष्ण’ इत्यादि वचन बोला—

पू०—पूर्वोक्त वचनों से तो भगवान् ने ज्ञानयोग द्वारा आत्मज्ञानी की निष्ठा का प्रतिपादन करने की इच्छा से केवल आत्मज्ञानी के लिये ही सब कर्मों का संन्यास कहा है, आत्मतत्त्व को न जाननेवाले के लिये नहीं। अतः कर्मानुष्ठान और कर्मसंन्यास—यह दोनों भिन्न-भिन्न पुरुषों द्वारा अनुष्ठान किये जाने योग्य होने के कारण दोनों में से किसी एक की श्रेष्ठतरता जानने की इच्छा से प्रश्न करना नहीं बन सकता।

उ०— ठीक है, तुम्हारे अभिप्राय से तो प्रश्न नहीं बन सकता; परंतु इसमें हमारा यह कहना है कि प्रश्न–कर्ता के अपने अभिप्राय से तो प्रश्न बन ही सकता है।

पू०—सो कैसे ?

उ०—पूर्वोक्त वचनों से भगवान् ने कर्मसंन्यास को कर्तव्यरूप से वर्णन किया है। इससे उसकी प्रधानता सिद्ध होती है। किंतु बिना कर्ता के उसकी कर्तव्यता असम्भव है [इसलिये एक पक्ष में अज्ञानी भी संन्यास का कर्ता हो जाता है, (सुतरां) उसी का अनुमोदन किया जाता है,] केवल आत्मज्ञानी-कर्तृक ही संन्यास होता है, यह कहना अभीष्ट नहीं है।

इस प्रकार कर्मानुष्ठान और कर्मसंन्यास—यह दोनों अज्ञानी द्वारा भी किये जा सकते हैं, ऐसा माननेवाले अर्जुन का, दोनों में से एक श्रेष्ठतर साधन जानने की इच्छा से प्रश्न करना, अयुक्त नहीं है। क्योंकि पूर्वोक्त प्रकार से उन दोनों का परस्पर विरोध होने के कारण दोनों में से किसी एक की ही कर्तव्यता प्राप्त होती है। ऐसा होने से जो श्रेष्ठतर हो उसे ही करना चाहिये, दूसरे को नहीं।

उत्तर में कहे हुए भगवान्‌ के वचनों का अर्थ निरूपण करने से भी, प्रश्नकर्ता का यही अभिप्राय प्रतीत होता है।

पू० — कैसे ?

उ०—संन्यास और कर्मयोग यह दोनों ही कल्याणकारक हैं और उन दोनों में से कर्मयोग श्रेष्ठ है—यह भगवान्‌ का उत्तर है।

इसमें विचारने की बात यह है कि इस प्रतिवचन से आत्मज्ञानी द्वारा किये हुए संन्यास और कर्मयोग का कल्याणकारकतारूप प्रयोजन बतलाकर उन दोनों में से ही किसी विशेषता के कारण, कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्मयोग की श्रेष्ठता कही गयी है। अथवा अज्ञानी द्वारा किये हुए संन्यास और कर्मयोग के विषय में यह दोनों बातें कही गयी हैं।

पू०—इससे क्या मतलब? चाहे आत्मवेत्ता द्वारा किये हुए संन्यास और कर्मयोग की कल्याणकारकता और उन दोनों में संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग की श्रेष्ठता कही गयी हो अथवा चाहे अज्ञानी द्वारा किये हुए संन्यास और कर्मयोग के विषय में ही वे दोनों बातें कही गयी हों।

उ०—आत्मज्ञानीकर्तृक कर्मसंन्यास और कर्मयोग का होना असम्भव है, इस कारण उन दोनों को कल्याणकारक कहना और उसके किये हुए कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्मयोग को श्रेष्ठ बतलाना, ये दोनों बातें ही नहीं बन सकतीं।

यदि कर्मसंन्यास और उसके विरुद्ध कर्मानुष्ठानरूप कर्मयोग इन दोनों को अज्ञानी कर्तृक मान लिया जाय तो फिर इन दोनों साधकों को कल्याणकारक बताना और कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्मयोग को श्रेष्ठ बतलाना— ये दोनों बातें ही बन सकती हैं।

परंतु आत्मज्ञानी के द्वारा कर्मसंन्यास और कर्मयोग का होना असम्भव है, इस कारण उन्हें कल्याणकारक कहना एवं कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्मयोग को श्रेष्ठ बतलाना—ये दोनों बातें नहीं बन सकतीं।

पू०—आत्मज्ञानी के द्वारा कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों का ही होना असम्भव है अथवा दोनों में से किसी एक का ही होना असम्भव है ? यदि किसी एक का होना ही असम्भव है तो कर्मसंन्यास का होना असम्भव है या कर्मयोग का ? साथ ही उसके असम्भव होने का कारण भी बतलाना चाहिये।

उ०—आत्मज्ञानी का मिथ्या ज्ञान निवृत्त हो जाता है, अतः उसके द्वारा विपर्यय-ज्ञानमूलक कर्मयोग का होना ही असम्भव है।

क्योंकि, जो जन्म आदि समस्त विकारों से रहित निष्क्रिय आत्मा को अपना स्वरूप समझ लेता है, जिसने यथार्थ ज्ञान द्वारा मिथ्याज्ञान को हटा दिया है, उस आत्मज्ञानी पुरुष के लिये निष्क्रिय आत्मस्वरूप से स्थित हो जाना रूप सर्व कर्मों का संन्यास बतलाकर, इस गीताशास्त्र में जहाँ-तहाँ आत्मस्वरूप सम्बन्धी निरूपण के प्रकरणों में, यथार्थज्ञान, मिथ्याज्ञान और उनके कार्य का परस्पर विरोध होने के कारण, उपर्युक्त संन्यास से विपरीत मिथ्याज्ञानमूलक कर्तृत्व-अभिमानपूर्वक सक्रिय आत्मस्वरूप में स्थित हो जाना रूप कर्मयोग के अभाव का ही प्रतिपादन किया गया है। इसलिये जिसका मिथ्याज्ञान निवृत्त हो गया है, ऐसे आत्मज्ञानी के लिये मिथ्याज्ञानमूलक कर्मयोग सम्भव नहीं, यह कहना ठीक ही है।

पू०—आत्मस्वरूप का निरूपण करनेवाले किन- किन प्रकरणों में ज्ञानी के लिये कर्मों का अभाव बताते हैं ?

उ०—‘उस आत्मा को तू अविनाशी समझ’ यहाँ से प्रकरण आरम्भ करके ‘जो इस आत्मा को मारनेवाला समझता है’ ‘जो इस अविनाशी नित्य आत्मा को जानता है’ इत्यादि वाक्यों में जगह-जगह ज्ञानी के लिये कर्मों का अभाव कहा है।

पू०—इस प्रकार तो आत्मस्वरूप निरूपण करनेवाले स्थानों में जगह-जगह कर्मयोग का भी प्रतिपादन किया ही है, जैसे ‘इसलिये हे भारत! तू युद्ध कर’ ‘स्वधर्म की ओर देखकर भी तुझे युद्ध से डरना उचित नहीं है’ ‘तेरा कर्म में ही अधिकार है’ इत्यादि। अतः आत्मज्ञानी के लिये कर्मयोग का होना असम्भव कैसे होगा?

उ०—क्योंकि सम्यक्-ज्ञान, मिथ्याज्ञान और उनके कार्य का परस्पर विरोध है।

आत्मतत्त्व को जाननेवाले सांख्ययोगियों की निष्क्रिय आत्मस्वरूप से स्थितिरूप ज्ञानयोगनिष्ठा को ‘ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानाम्’ इस वचन द्वारा अज्ञानियों द्वारा की जानेवाली कर्मयोगनिष्ठा से पृथक् कर दिया है।

कृतकृत्य हो जाने के कारण आत्मज्ञानी के अन्य सब प्रयोजनों का अभाव हो जाता है।

‘उसका कोई कर्तव्य नहीं रहता’ इस कथन से ज्ञानी के अन्य कर्तव्यों का अभाव बताया गया है।

‘कर्मों का आरम्भ बिना किये ज्ञाननिष्ठा नहीं मिलती’ ‘हे महाबाहो! बिना कर्मयोग के संन्यास प्राप्त करना कठिन है’ इत्यादि वचनों से कर्मयोग को आत्मज्ञान का अङ्ग बताया गया है।

‘उसी योगारूढ़ को उपशम कर्तव्य है’ इस वचन से यथार्थ ज्ञानी के लिये कर्मयोग के अभाव का वर्णन है।

‘केवल शरीर सम्बन्धी कर्म करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता’ यहाँ भी ज्ञानी के लिये शरीर–स्थिति के कारणरूप कर्मों से अतिरिक्त कर्मों का निवारण किया गया है।

तथा ‘तत्त्ववेत्ता योगी ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता’ इस कथन से केवल शरीर-यात्रा के लिये किये जानेवाले दर्शन, श्रवण आदि कर्मों में भी यथार्थदर्शी के लिये ‘मैं करता हूँ’ इस प्रत्यय को समाहितचित्त द्वारा हटाने का उपदेश है।

इन सब कारणोंसे आत्मवेत्ता पुरुष के लिये यथार्थ-दर्शनसे विरुद्ध तथा मिथ्याज्ञानसे होनेवाला कर्मयोग स्वप्नमें भी सम्भव नहीं माना जा सकता।

इसलिये यहाँ अज्ञानीके संन्यास और कर्मयोगको ही कल्याणकारक बताया है और उस अज्ञानीके संन्यासकी अपेक्षा ही (कर्मयोगकी श्रेष्ठताका विधान है)। अर्थात् जो पहले कहे हुए आत्मज्ञानीके संन्याससे विलक्षण है तथा जो कर्तापनके ज्ञानसे युक्त होनेके कारण

एकदेशीय* कर्मसंन्यास है और यम-नियमादि साधनोंसे युक्त होनेके कारण अनुष्ठान करनेमें कठिन है, ऐसे संन्यासकी अपेक्षा कर्मयोग सुकर है, अतः उसकी श्रेष्ठताका विधान है।

इस प्रकार भगवान्द्वारा दिये हुए उत्तरके अर्थका निरूपण करनेसे भी प्रश्नकर्ता का अभिप्राय पहले बतलाया हुआ ही निश्चित होता है, यह सिद्ध हुआ।

‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते’ इस श्लोकसे ज्ञान और कर्मका एक साथ साधन होना असम्भव समझकर इन दोनोंमें जो कल्याणकर है, वह मुझसे कहिये, इस प्रकार अर्जुन द्वारा पूछे जाने पर भगवान्‌ने यह निर्णय किया कि सांख्ययोगियोंकी अर्थात् संन्यासियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे कही गयी है।

केवल संन्यास करनेमात्रसे ही सिद्धिको प्राप्त नहीं होता है, इस वचनसे ज्ञानसहित संन्यासको ही सिद्धिका साधन माना है, साथ ही कर्मयोगका भी विधान किया है, इसलिये ज्ञानरहित संन्यास कल्याणकर है अथवा कर्मयोग, इन दोनोंकी विशेषता जाननेकी इच्छासे अर्जुन बोले—

तात्पर्य पढ़ें

न हि परस्य संशयः परेण छेत्तव्यतां प्राप्तो

येन स्वस्य इति विशिष्यते अत आत्मविषयः

अपि स्वस्य एव भवति।

छित्वा एनं संशयं स्वविनाशहेतुभूतं योगं

सम्यग्दर्शनोपायकर्मानुष्ठानम् आतिष्ठ कुरु इत्यर्थः ।

उत्तिष्ठ इदानीं युद्धाय भारत इति ॥ ४२ ॥

तस्मात् पापिष्ठम् अज्ञानसम्भूतम् अज्ञानाद् अविवेकाद् जातं हत्स्थं हृदि बुद्धौ स्थितं ज्ञानासिना शोकमोहादिदोषहरं सम्यग्दर्शनं ज्ञानं तद् एव असिः खड्गः तेन ज्ञानासिना आत्मनः स्वस्य ।

आत्मविषयत्वात् संशयस्य ।

‘कर्मण्यकर्म यः पश्येत्’ इत्यारभ्य ‘स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्’ ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्’ ‘शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्’ ‘यदृच्छालाभसन्तुष्टः’ ‘ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः’ ‘कर्मजान्विद्धि तान्सर्वान्’ ‘सर्वं कर्माखिलं पार्थ’ ‘ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि’ ‘योगसन्न्यस्तकर्माणम्’ इत्यन्तैः वचनैः सर्वकर्मसन्न्यासम् अवोचद् भगवान् ।

‘छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठ’ इति अनेन वचनेन योगं च कर्मानुष्ठानलक्षणम् अनुतिष्ठ इति उक्तवान्।

तयोः उभयोः च कर्मानुष्ठानकर्मसन्न्यासयोः स्थितिगतिवत् परस्परविरोधाद् एकेन सह कर्तुम् अशक्यत्वात् कालभेदेन च अनुष्ठानविधानाभावाद् अर्थाद् एतयोः अन्यतरकर्तव्यताप्राप्तौ सत्याम्, यत् प्रशस्यतरम् एतयोः कर्मानुष्ठानकर्मसन्न्यासयोः तत् कर्तव्यं न इतरद् इति एवं मन्यमानः प्रशस्यतरबुभुत्सया अर्जुन उवाच ‘सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण’ इत्यादिना।

ननु च आत्मविदो ज्ञानयोगेन निष्ठां प्रतिपिपादयिषन् पूर्वोदाहृतैः वचनैः भगवान् सर्वकर्मसन्न्यासम् अवोचद् न तु अनात्मज्ञस्य अतः च कर्मानुष्ठानकर्मसन्न्यासयोः भिन्नपुरुष- विषयत्वाद् अन्यतरस्य प्रशस्यतरत्वबुभुत्सया प्रश्नः अनुपपन्नः।

सत्यम् एव त्वदभिप्रायेण प्रश्नो न उप-पद्यते प्रष्टुः स्वाभिप्रायेण पुनः प्रश्नो युज्यते एव इति वदामः।

पूर्वोदाहृतैः वचनैः भगवता कर्मसन्न्यासस्य कर्तव्यतया विवक्षितत्वात् प्राधान्यम्, अन्तरेण च कर्तारं तस्य कर्तव्यत्वासम्भवात्, अनात्मविद् अपि कर्ता पक्षे प्राप्तः अनूद्यते एव न पुनः आत्मवित्कर्तृकत्वम् एव सन्न्यासस्य विवक्षितम् इति।

एवं मन्वानस्य अर्जुनस्य कर्मानुष्ठानकर्म-सन्न्यासयोः अविद्वत्पुरुषकर्तृकत्वम् अपि अस्ति इति पूर्वोक्तेन प्रकारेण तयोः परस्परविरोधाद् अन्यतरस्य कर्तव्यत्वे प्राप्ते प्रशस्यतरं च कर्तव्यं न इतरद् इति प्रशस्यतरविविदिषया प्रश्नो न अनुपपन्नः ।

प्रतिवचनवाक्यार्थनिरूपणेन अपि प्रष्टुः

अभिप्राय एवम् एव इति गम्यते।

सन्न्यासकर्मयोगौ निःश्रेयसकरौ तयोः तु

कर्मयोगो विशिष्यते इति प्रतिवचनम् ।

एतद् निरूप्यं किम् अनेन आत्म-वित्कर्तृकयोः सन्न्यासकर्मयोगयोः निःश्रेयसकरत्वं प्रयोजनम् उक्त्वा तयोः एव कुतश्चिद् विशेषात् कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगस्य विशिष्टत्वम् उच्यते आहोस्विद् अनात्मवित्कर्तृकयोः सन्न्यास-कर्मयोगयोः तद् उभयम् उच्यते इति ।

किं च अतो यदि आत्मवित्कर्तृकयोः सन्न्यासकर्मयोगयोः निःश्रेयसकरत्वं तयोः तु कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगस्य विशिष्टत्वम् उच्यते यदि वा अनात्मवित्कर्तृकयोः सन्न्यासकर्म-योगयोः तद् उभयम् उच्यते इति ।

अत्र उच्यते, आत्मवित्कर्तृकयोः सन्न्यास-कर्मयोगयोः असम्भवात् तयोः निःश्रेयसकरत्व-वचनं तदीयात् च कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगस्य विशिष्टत्वाभिधानम् इति एतद् उभयम् अनुपपन्नम् ।

यदि अनात्मविदः कर्मसन्न्यासः तत्प्रतिकूलः च कर्मानुष्ठानलक्षणः कर्मयोगः सम्भवेतां तदा तयोः निःश्रेयसकरत्वोक्तिः कर्मयोगस्य च कर्मसन्न्यासाद् विशिष्टत्वाभिधानम् इति एतद् उभयम् उपपद्यते ।

आत्मविदः तु सन्न्यासकर्मयोगयोः असम्भवात् तयोः निःश्रेयसकरत्वाभिधानं कर्मसन्न्यासात् च कर्मयोगो विशिष्यते इति च अनुपपन्नम् ।

अत्र आह, किम्, आत्मविदः सन्न्यासकर्म-योगयोः अपि असम्भव आहोस्विद् अन्यतरस्य असम्भवो यदा च अन्यतरस्य असम्भवः तदा किं कर्मसन्न्यासस्य उत कर्मयोगस्य इति असम्भवे कारणं च वक्तव्यम् इति।

अत्र उच्यते, आत्मविदो निवृत्तमिथ्याज्ञान-त्वात् विपर्ययज्ञानमूलस्य कर्मयोगस्य असम्भवः स्यात् ।

जन्मादिसर्वविक्रियारहितत्वेन निष्क्रियम् आत्मानम् आत्मत्वेन यो वेत्ति यस्य आत्मविदः सम्यग्दर्शनेन अपास्तमिथ्याज्ञानस्य निष्क्रियात्म- स्वरूपावस्थानलक्षणं सर्वकर्मसन्न्यासम् उक्त्वा, तद्विपरीतस्य मिथ्याज्ञानमूलकर्तृत्वाभि- मानपुरःसरस्य सक्रियात्मस्वरूपावस्थानरूपस्य कर्मयोगस्य इह शास्त्रे तत्र तत्र आत्मस्वरूपनिरूपणप्रदेशेषु सम्यग्ज्ञानमिथ्या- ज्ञानतत्कार्यविरोधाद् अभावः प्रतिपाद्यते, यस्मात्, तस्मात् आत्मविदो निवृत्तमिथ्या- ज्ञानस्य विपर्ययज्ञानमूलः कर्मयोगो न सम्भवति इति युक्तम् उक्तं स्यात्।

केषु केषु पुनः आत्मस्वरूपनिरूपणप्रदेशेषु

आत्मविदः कर्माभावः प्रतिपाद्यते इति ।

अत्र उच्यते ‘अविनाशि तु तद्विद्धि’ इति प्रकृत्य ‘य एनं वेत्ति हन्तारम्’ ‘वेदाविनाशिनं नित्यम्’ इत्यादौ तत्र तत्र आत्मविदः कर्माभाव उच्यते।

ननु च कर्मयोगः अपि आत्मस्वरूप- निरूपणप्रदेशेषु तत्र तत्र प्रतिपाद्यते एव तद् यथा ‘तस्माद्युध्यस्व भारत’ ‘स्वधर्ममपि चावेक्ष्य’ ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ इत्यादौ । अतः च कथम् आत्मविदः कर्मयोगस्य असम्भवः स्याद् इति ।

अत्र उच्यते सम्यग्ज्ञानमिथ्याज्ञानतत्कार्य-विरोधात् ।

‘ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानाम्’ इति अनेन साङ्ख्यानाम् आत्मतत्त्वविदाम् अनात्मवित्कर्तृक-कर्मयोगनिष्ठातो निष्क्रियात्मस्वरूपावस्थान-लक्षणाया ज्ञानयोगनिष्ठायाः पृथक्करणात् ।

कृतकृत्यत्वेन आत्मविदः प्रयोजनान्त- राभावात्।

‘तस्य कार्यं न विद्यते’ इति कर्तव्यान्तराभाव-वचनात् च।

‘न कर्मणामनारम्भात्’ ‘सन्न्यासस्तु महाबाहो’

दुःखमाप्तुमयोगतः’ इत्यादिना च आत्मज्ञानाङ्ग-त्वेन कर्मयोगस्य विधानात्।

‘योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते’ इति अनेन च उत्पन्नसम्यग्दर्शनस्य कर्मयोगाभाववचनात् ।

‘शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्रोति किल्बिषम्’

इति च शरीरस्थितिकारणातिरिक्तस्य कर्मणो निवारणात् ।

‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ इति अनेन च शरीरस्थितिमात्रप्रयुक्तेषु अपि दर्शनश्रवणादिकर्मसु आत्मयाथात्म्यविदः करोमि इति प्रत्ययस्य समाहितचेतस्तया सदा अकर्तव्यत्वोपदेशात् ।

आत्मतत्त्वविदः सम्यग्दर्शनविरुद्धो मिथ्या-ज्ञानहेतुकः कर्मयोगः स्वप्ने अपि न सम्भावयितुं शक्यते यस्मात् ।

तस्माद् अनात्मवित्कर्तृकयोः एव सन्न्यासकर्मयोगयोः निःश्रेयसकरत्ववचनं तदीयात् च कर्मसन्न्यासात् पूर्वोक्तात्मवित्कर्तृकसर्वकर्मसन्न्यासविलक्षणात् सति एव कर्तत्व-

विज्ञाने कर्मैकदेशविषयाद् यमनियमादिसहितत्वेन

च दुरनुष्ठेयत्वात् सुकरत्वेन च कर्मयोगस्य विशिष्टत्वाभिधानम् इति।

एवं प्रतिवचनवाक्यार्थनिरूपणेन अपि

पूर्वोक्त: प्रष्टु: अभिप्रायो निश्चीयते इति स्थितम् ।

‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते’ इति अत्र ज्ञानकर्मणोः सहासम्भवे यत् श्रेय एतयोः तद् मे ब्रूहि इति एवं पृष्ठः अर्जुनेन भगवान् साङ्ख्यानां सन्न्यासिनां ज्ञानयोगेन निष्ठा पुनः कर्मयोगेन योगिनां निष्ठा प्रोक्ता इति निर्णयं चकार।

न च सन्न्यसनाद् एव केवलात् सिद्धिं समधिगच्छति इति वचनाद् ज्ञानसहितस्य सिद्धिसाधनत्वम् इष्टं कर्मयोगस्य च विधानात् । ज्ञानरहितः सन्न्यासः श्रेयान् किंवा कर्मयोगः श्रेयान् इति एतयोः विशेषबुभुत्सया—

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्र्यां संहितायां वैयासिक्यां भीष्म-

पर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसन्त्र्यासयोगो

नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छंकर-

भगवतः कृतौ श्रीभगवद्गीताभाष्ये ब्रह्मयज्ञप्रशंसा नाम

चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥