अध्याय 4 - श्लोक 5

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥

bahūni me vyatītāni janmāni tava cārjuna.
tānyahaṃ veda sarvāṇi na tvaṃ vettha parantapa .. 5 ..


हे अर्जुन! मेरे और तेरे पहले बहुत जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, तू नहीं जानता; क्योंकि पुण्य-पाप आदिके संस्कारों से तेरी ज्ञानशक्ति आच्छादित हो रही है।

परंतु मैं तो नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाववाला हूँ, इस कारण मेरी ज्ञानशक्ति आवरणरहित है, इसलिये हे परन्तप! मैं (सब कुछ) जानता हूँ ॥ ५ ॥

तो फिर आप नित्य ईश्वर का पुण्य-पाप से सम्बन्ध न होनेपर भी जन्म कैसे होता है? इसपर कहा जाता है—

तात्पर्य पढ़ें

बहूनि मे मम व्यतीतानि अतिक्रान्तानि जन्मानि तव च हे अर्जुन तानि अहं वेद जाने सर्वाणि न त्वं वेत्थ जानीषे, धर्माधर्मादिप्रतिबद्ध-ज्ञानशक्तित्वात्।

अहं पुनः नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वाद् अनावरणज्ञानशक्तिः इति वेद अहं हे परन्तप ॥ ५ ॥

कथं तर्हि तव नित्येश्वरस्य धर्माधर्माभावे अपि जन्म इति उच्यते—