अध्याय 5 - श्लोक 1

कथम्—
कथम्—
अर्जुन उवाच—
सत्र्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥

katham—
katham—
arjuna uvāca—
satryāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa punaryogaṃ ca śaṃsasi .
yacchreya etayorekaṃ tanme brūhi suniścitam .. 1 ..


आप पहले तो शास्त्रोक्त बहुत प्रकार के अनुष्ठानरूप कर्मों का त्याग करने के लिये कहते हैं अर्थात् उपदेश करते हैं और फिर उनके अनुष्ठान की अवश्य-कर्तव्यतारूप योग को भी बतलाते हैं।

इसलिये मुझे यह शङ्का होती है कि इनमें से कौन-सा श्रेयस्कर है। कर्मों का अनुष्ठान करना कल्याणकर है अथवा उनका त्याग करना ?

जो श्रेष्ठतर हो उसी का अनुष्ठान करना चाहिये, इसलिये इन कर्म संन्यास और कर्मयोग में जो श्रेष्ठ हो अर्थात् जिसका अनुष्ठान करने से आप यह मानते हैं कि मुझे कल्याण की प्राप्ति होगी, उस भलीभाँति निश्चय किये हुए एक ही अभिप्राय को अलग करके कहिये; क्योंकि एक पुरुष द्वारा एक साथ दोनों का अनुष्ठान होना असम्भव है ॥ १ ॥

अर्जुन के प्रश्न का निर्णय करने के लिये भगवान् अपना अभिप्राय बतलाते हुए बोले—

तात्पर्य पढ़ें

सन्न्यासं परित्यागं कर्मणां शास्त्रीयाणाम् अनुष्ठानविशेषाणां शंससि कथयसि इति एतत् । पुनः योगं च तेषाम् एव अनुष्ठानम् अवश्य-कर्तव्यत्वं शंससि ।

अतो मे कतरत् श्रेय इति संशयः किं कर्मानुष्ठानं श्रेयः किंवा तद्धानम् इति।

प्रशस्यतरं च अनुष्ठेयम् अतः च यत् श्रेयः प्रशस्यतरम् एतयोः कर्मसन्न्यास-कर्मानुष्ठानयोः यदनुष्ठानात् श्रेयोऽवाप्तिः मम स्याद् इति मन्यसे तद् एकम् अन्यतरत् सहैकपुरुषानुष्ठेयत्वा-सम्भवाद् मे ब्रूहि सुनिश्चितम् अभिप्रेतं तव इति ॥ १ ॥

स्वाभिप्रायम् आचक्षाणो निर्णयाय— श्रीभगवान् उवाच—

  • ऐसे संन्यास में गृहस्थाश्रमके कर्मोंका तो त्याग है, पर साथ ही संन्यास–आश्रमके कर्मों में अभिमान रहता है, इसलिये यह एकदेशीय संन्यास है।