ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥
brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ .
lipyate na sa pāpena padmapatramivāmbhasā .. 10 ..
जो ‘स्वामी के लिये कर्म करनेवाले नौकर की भाँति मैं ईश्वर के लिये करता हूँ’ इस भाव से सब कर्मों को ईश्वर में अर्पण करके यहाँ तक कि मोक्षरूप फल की भी आसक्ति छोड़कर कर्म करता है।
वह, जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता, वैसे ही पापों से लिप्त नहीं होता ॥ १० ॥
उसके कर्मों का फल तो केवल अन्त:करणकी शुद्धिमात्र ही होता है, क्योंकि—
तात्पर्य पढ़ें
ब्रह्मणि ईश्वरे आधाय निक्षिप्य तदर्थं करोमि इति भृत्य इव स्वाम्यर्थं सर्वाणि कर्माणि मोक्षे अपि फले सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः सर्वकर्माणि ।
लिप्यते न स पापेन न सम्बध्यते पद्मपत्रम्
केवलं सत्त्वशुद्धिमात्रफलम् एव तस्य कर्मणः स्यात्, यस्मात्—