नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥
sarvakarmāṇi manasā sannyasyāste sukhaṃ vaśī .
navadvāre pure dehī naiva kurvanna kārayan .. 13 ..
( वशी—जितेन्द्रिय पुरुष) समस्त कर्मोंको मनसे छोड़कर अर्थात् नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध—इन सब कर्मोंको कर्मादिमें अकर्म-दर्शनरूप विवेक-बुद्धिके द्वारा त्यागकर सुखपूर्वक स्थित हो जाता है।
मन, वाणी और शरीरकी चेष्टाको छोड़कर, परिश्रमरहित, प्रसन्नचित्त और आत्मासे अतिरिक्त अन्य सब बाह्य प्रयोजनोंसे निवृत्त हुआ (वह) सुखपूर्वक स्थित होता है, ऐसे कहा जाता है।
वशी—जितेन्द्रिय पुरुष कहाँ और कैसे रहता है ? सो कहते हैं—
नौ द्वारवाले पुरमें रहता है। अभिप्राय यह कि दो कान, दो नेत्र, दो नासिका और एक मुख—शब्दादि विषयोंको उपलब्ध करनेके ये सात द्वार शरीरके ऊपरी भागमें हैं और मल-मूत्रका त्याग करनेके लिये दो नीचेके अङ्गमें हैं, इन नौ द्वारोंवाला शरीर पुर कहलाता है। शरीर भी एक पुरकी भाँति पुर है, जिसका स्वामी आत्मा है, उस आत्माके लिये ही जिनके सब प्रयोजन हैं एवं जो अनेक फल और विज्ञानके उत्पादक हैं, उन इन्द्रिय, मन, बुद्धि और विषयरूप पुरवासियोंसे जो युक्त है, उस नौ द्वारवाले पुरमें देही सब कर्मोंको छोड़कर रहता है।
पू०—इस विशेषणसे क्या सिद्ध हुआ ? संन्यासी हो चाहे असंन्यासी, सभी जीव शरीरमें ही रहते हैं। इस स्थलमें विशेषण देना व्यर्थ है।
उ०—जो अज्ञानी जीव शरीर और इन्द्रियोंके संघातमात्रको आत्मा माननेवाले हैं। वे सब ‘घरमें भूमिपर या आसनपर बैठता हूँ’ ऐसे ही माना करते हैं; क्योंकि देहमात्रमें आत्मबुद्धियुक्त अज्ञानियोंको ‘घरकी भाँति शरीरमें रहता हूँ’ यह ज्ञान होना सम्भव नहीं।
परंतु ‘देहादिसंघातसे आत्मा भिन्न है’ ऐसा जाननेवाले विवेकीको ‘मैं शरीरमें रहता हूँ’ यह प्रतीति हो सकती है।
तथा निर्लेप आत्मामें अविद्यासे आरोपित जो परकीय (देह–इन्द्रियादिके) कर्म हैं, उनका विवेक–विज्ञानरूप विद्याद्वारा मनसे संन्यास होना भी सम्भव है।
जिससे विवेक-विज्ञान उत्पन्न हो गया है ऐसे सर्वकर्मसंन्यासीका भी घरमें रहनेकी भाँति नौ द्वारवाले शरीररूप पुरमें रहना प्रारब्ध-कर्मोंके अवशिष्ट संस्कारोंकी अनुवृत्तिसे बन सकता है; क्योंकि शरीरमें ही प्रारब्धफलभोगका विशेष ज्ञान होना सम्भव है।
अतः ज्ञानी और अज्ञानीकी प्रतीतिके भेदकी अपेक्षासे ‘देहे एव आस्ते’ इस विशेषणका फल अवश्य ही है।
यद्यपि ‘कार्य, करण और कर्म जो अविद्यासे आत्मामें आरोपित हैं उन्हें छोड़कर रहता है’ ऐसा कहा है तथापि आत्मासे नित्य सम्बन्ध रखनेवाले कर्तापन और करानेकी प्रेरकता—ये दोनों भाव तो उस (आत्मा)-में रहेंगे ही। इस शङ्कापर कहते हैं—
स्वयं न करता हुआ और शरीर-इन्द्रियादिसे न करवाता हुआ अर्थात् उनको कर्मोंमें प्रवृत्त न करता हुआ (रहता है)।
पू०—जैसे गमन करनेवालेकी गति गमनरूप व्यापारका त्याग करनेसे नहीं रहती, वैसे ही आत्मामें जो कर्तृत्व और कारयितृत्व हैं वह क्या आत्माके नित्य सम्बन्धी होते हुए ही संन्याससे नहीं रहते? अथवा स्वभावसे ही आत्मामें नहीं हैं?
उ०—आत्मामें कर्तृत्व और कारयितृत्व स्वभावसे ही नहीं हैं; क्योंकि ‘यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है।’ ‘हे कौन्तेय! यह आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है।’ ऐसा कह चुके हैं एवं ‘ध्यान करता हुआ-सा, क्रिया करता हुआ-सा।’ इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है ॥ १३ ॥
तात्पर्य पढ़ें
सर्वाणि कर्माणि सर्वकर्माणि सन्न्यस्य परित्यज्य नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रतिषिद्धं च सर्वकर्माणि तानि मनसा विवेकबुद्ध्या कर्मादौ अकर्म-सन्दर्शनेन सन्न्यस्य इत्यर्थः, आस्ते तिष्ठति सुखम् ।
त्यक्तवाङ्मनःकायचेष्टो निरायासः प्रसन्नचित्त
आत्मनः अन्यत्र निवृत्तबाह्यसर्वप्रयोजन इति सुखम् आस्ते इति उच्यते।
वशी जितेन्द्रिय इत्यर्थः, क्व कथम् आस्ते इति आह—
नवद्वारे पुरे सप्त शीर्षण्यानि आत्मन उपलब्धिद्वाराणि अर्वाग् द्वे मूत्रपुरीषविसर्गार्थे तैः द्वारैः नवद्वारं पुरम् उच्यते । शरीरं पुरम् इव पुरम् आत्मैकस्वामिकम्, तदर्थप्रयोजनैः च इन्द्रियमनोबुद्धिविषयैः अनेकफलविज्ञानस्य उत्पादकैः पौरैः इव अधिष्ठितम्, तस्मिन् नवद्वारे पुरे देही सर्वं कर्म सन्न्यस्य आस्ते ।
किं विशेषणेन, सर्वो हि देही सन्न्यासी असन्न्यासी वा देहे एव आस्ते, तत्र अनर्थकं विशेषणम् इति।
उच्यते यः तु अज्ञो देही देहेन्द्रियसङ्घात-मात्रात्मदर्शी स सर्वो गेहे भूमौ आसने वा आसे इति मन्यते। न हि देहमात्रात्मदर्शिनो गेहे इव देहे आसे इति प्रत्ययः सम्भवति।
देहादिसङ्घातव्यतिरिक्तात्मदर्शिनः तु देहे
आसे इति प्रत्यय उपपद्यते।
परकर्मणां च परस्मिन् आत्मनि अविद्यया अध्यारोपितानां विद्यया विवेकज्ञानेन मनसा सन्न्यास उपपद्यते ।
उत्पन्नविवेकज्ञानस्य सर्वकर्मसन्न्यासिनः अपि
गेहे इव देहे एव नवद्वारे पुरे आसनम्
प्रारब्धफलकर्मसंस्कारशेषानुवृत्त्या देहे एव विशेषविज्ञानोत्पत्तेः ।
देहे एव आस्ते इति अस्ति एव विशेषणफलं
विद्वदविद्वत्प्रत्ययभेदापेक्षत्वात् ।
यद्यपि कार्यकरणकर्माणि अविद्यया आत्मनि
अध्यारोपितानि सन्न्यस्य आस्ते इति उक्तं तथापि
आत्मसमवायि तु कर्तृत्वं कारयितृत्वं च स्याद् इति आशङ्क्य आह—
न एव कुर्वन् स्वयं न कार्यकरणानि कारयन्
क्रियासु प्रवर्तयन् ।
किं यत् तत् कर्तृत्वं कारयितृत्वं च देहिनः स्वात्मसमवायि सत् सन्न्यासाद् न भवति यथा गच्छतो गतिः गमनव्यापारपरित्यागे न स्यात् तद्वत्, किं वा स्वत एव आत्मनो नास्ति इति।
अत्र उच्यते न अस्ति आत्मनः स्वतः कर्तृत्वं कारयितृत्वं च। उक्तं हि—‘अविकार्योऽयमुच्यते’ ‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ इति। ‘ध्यायतीव लेलायतीव’ (बृ० उ० ४। ३। ४) इति च श्रुतेः ॥ १३ ॥