अध्याय 5 - श्लोक 19

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥

ihaiva tairjitaḥ sargo yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥ
nirdoṣaṃ hi samaṃ brahma tasmādbrahmaṇi te sthitāḥ .. 19 ..


जिनका अन्तःकरण समता में अर्थात् सब भूतोंके अन्तर्गत ब्रह्मरूप समभावमें स्थित यानी निश्चल हो गया है, उन समदर्शी पण्डितोंने यहाँ जीवितावस्थामें ही सर्गको यानी जन्मको जीत लिया है अर्थात् उसे अपने अधीन कर लिया है।

क्योंकि ब्रह्म निर्दोष (और सम) है। यद्यपि मूर्ख लोगोंको दोषयुक्त चाण्डालादिमें उनके दोषोंके कारण आत्मा दोषयुक्त सा प्रतीत होता है, तो भी वास्तवमें वह (आत्मा) उनके दोषोंसे निर्दोष ही है।

चेतन आत्मा निर्गुण होनेके कारण अपने गुणके भेदसे भी भिन्न नहीं है। भगवान् भी इच्छादिको क्षेत्रके ही धर्म बतलावेंगे तथा ‘अनादि और निर्गुण होनेके कारण’ (आत्मा लिप्त नहीं होता) यह भी कहेंगे। (वैशेषिक शास्त्रमें बतलाये हुए नित्य द्रव्यगत) ‘अन्त्य विशेष’ भी आत्मामें भेद उत्पन्न करनेवाले नहीं हैं; क्योंकि प्रत्येक शरीरमें उन अन्त्य विशेषोंके होनेका कोई प्रमाण सम्भव नहीं है।

अतः (यह सिद्ध हुआ कि) ब्रह्म सम है और एक ही है। इसलिये वे समदर्शी पुरुष ब्रह्ममें ही स्थित हैं, इसी कारण उनको दोष की गन्ध भी स्पर्श नहीं कर पाती; क्योंकि उनमेंसे देहादि संघातको आत्मारूपसे देखनेका अभिमान जाता रहा है।

‘समासमाभ्यां विषमसमे पूजातः’ यह सूत्र पूजा विषयक विशेषणसे युक्त होनेके कारण देहादि संघातमें आत्मदृष्टिके अभिमानवाले पुरुषोंके विषयमें है।

क्योंकि पूजा, दान आदि कर्मोंमें (भेदबुद्धिका) कारण ‘ब्रह्मवेत्ता’ ‘छओं अङ्गोंको जाननेवाला’ ‘चारों वेदोंको जाननेवाला’ इत्यादि विशेष गुणोंका सम्बन्ध देखा जाता है।

परंतु ब्रह्म सम्पूर्ण गुण-दोषोंके सम्बन्धसे रहित है, इसलिये यह (कहना) ठीक है कि वे ब्रह्ममें स्थित हैं।

इसके अतिरिक्त ‘समासमाभ्याम्’ इत्यादि कथन तो कर्मियोंके विषयमें है और यह ‘सर्वकर्माणि मनसा’ इस श्लोकसे लेकर अध्यायसमाप्तितक सारा प्रकरण सर्व-कर्म-संन्यासीके विषयमें है ॥ १९ ॥

क्योंकि निर्दोष और सम ब्रह्म ही आत्मा है, इसलिये—

तात्पर्य पढ़ें

इह एव जीवद्भिः एव तैः समदर्शिभिः पण्डितैः जितो वशीकृतः सर्गो जन्म येषां साम्ये सर्वभूतेषु ब्रह्मणि समभावे स्थितं निश्चलीभूतं मनः अन्तःकरणम् ।

निर्दोषं यद्यपि दोषवत्सु श्वपाकादिषु मूढैः तद्दोषैः दोषवद् इव विभाव्यते तथापि तद्दोषैः अस्पृष्टम् इति। निर्दोषं दोषवर्जितं हि यस्मात्।

न अपि स्वगुणभेदभिन्नं निर्गुणत्वात् चैतन्यस्य, वक्ष्यति च भगवान् इच्छादीनां क्षेत्रधर्मत्वम् ‘अनादित्वाद् निर्गुणत्वात्’ इति च। न अपि अन्त्या विशेषा आत्मनो भेदकाः सन्ति प्रतिशरीरं तेषां सत्त्वे प्रमाणानुपपत्तेः।

अतः समं ब्रह्म एकं च तस्माद् ब्रह्मणि एव ते स्थिताः तस्माद् न दोषगन्धमात्रमपि तान् स्पृशति, देहादिसङ्घातात्मदर्शनाभिमानाभावात्।

देहादिसङ्घातात्मदर्शनाभिमानवद्विषयं तु तत् सूत्रम् ‘समासमाभ्यां विषमसमे पूजातः’ इति पूजाविषयत्वविशेषणात् ।

दृश्यते हि ब्रह्मवित् षडङ्गवित् चतुर्वेदविद्

इति पूजादानादौ गुणविशेषसम्बन्धः कारणम् ।

ब्रह्म तु सर्वगुणदोषसम्बन्धवर्जितम् इति

अतो ब्रह्मणि ते स्थिता इति युक्तम्।

कर्मिविषयं च ‘समासमाभ्याम्’ इत्यादि, इदं तु सर्वकर्मसन्न्यासिविषयं प्रस्तुतम् ‘सर्व-कर्माणि मनसा’ इति आरभ्य आ-अध्यायपरिसमाप्तेः ॥ १९ ॥

यस्माद् निर्दोषं समं ब्रह्म आत्मा तस्मात्—