सन्न्यासः कर्मयोगश्च
निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु
कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो
विशिष्यते ॥ २ ॥
निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु
कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो
विशिष्यते ॥ २ ॥
sannyāsaḥ karmayogaśca
niḥśreyasakarāvubhau .
tayostu
karmasannyāsātkarmayogo
viśiṣyate .. 2 ..
संन्यास—कर्मों का परित्याग और कर्मयोग उनका अनुष्ठान करना, ये दोनों ही कल्याणकारक अर्थात् मुक्तिके देनेवाले हैं।
यद्यपि ज्ञान की उत्पत्ति में हेतु होनेसे ये दोनों ही कल्याणकारक हैं तथापि कल्याण के उन दोनों कारणोंमें ज्ञानरहित केवल संन्यासकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है। इस प्रकार भगवान् कर्मयोग की स्तुति करते हैं ॥ २ ॥
(कर्मयोग श्रेष्ठ) कैसे है? इसपर कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
सन्यास: कर्मणां परित्यागः कर्मयोगः च तेषाम् अनुष्ठानं तौ उभौ अपि निःश्रेयसकरौ निःश्रेयसं मोक्षं कुर्वाते।
ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन उभौ यद्यपि निःश्रेयसकरौ तथापि तयोः तु निःश्रेयसहेत्वोः कर्मसन्न्यासात् केवलात् कर्मयोगो विशिष्यते इति कर्मयोगं स्तौति ॥ २ ॥
कस्मात्, इति आह—