आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
ye hi saṃsparśajā bhogā duḥkhayonaya eva te.
ādyantavantaḥ kaunteya na teṣu ramate budhaḥ .. 22 ..
क्योंकि विषय और इन्द्रियों के सम्बन्धसे उत्पन्न जो भोग हैं, वे सब अविद्याजन्य होनेसे केवल दुःखके ही कारण हैं; क्योंकि आध्यात्मिक आदि (तीनों प्रकारके) दुःख उनके ही निमित्तसे होते हुए देखे जाते हैं।
‘एव’ शब्दसे यह भी प्रकट होता है कि ये जैसे इस लोकमें दुःखप्रद हैं, वैसे ही परलोकमें भी दुःखद हैं।
संसारमें सुखकी गन्धमात्र भी नहीं है, यह समझकर विषयरूप मृगतृष्णिकासे इन्द्रियोंको हटा लेना चाहिये।
ये विषय-भोग केवल दुःखके कारण हैं, इतना ही नहीं, किंतु ये आदि-अन्तवाले भी हैं, विषय और इन्द्रियोंका संयोग होना भोगों का आदि है और वियोग होना ही अन्त है।
इसलिये जो आदि-अन्तवाले हैं वे केवल बीचके क्षणमें ही प्रतीतिवाले होनेसे अनित्य हैं।
हे कौन्तेय ! परमार्थतत्त्वको जाननेवाला विवेकशील बुद्धिमान् पुरुष उन भोगोंमें नहीं रमा करता। क्योंकि केवल अत्यन्त मूढ़ पुरुषोंकी ही पशु आदिकी भाँति विषयोंमें प्रीति देखी जाती है ॥ २२ ॥
कल्याणके मार्गका प्रतिपक्षी यह (काम-क्रोधका वेगरूप) दोष बड़ा दुःखदायक है, सब अनर्थों की प्राप्तिका कारण है और निवारण करनेमें अति कठिन भी है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि इसको नष्ट करनेके लिये खूब प्रयत्न करना चाहिये।
तात्पर्य पढ़ें
ये हि यस्मात् संस्पर्शजा विषयेन्द्रिय-संस्पर्शेभ्यो जाता भोगा भुक्तयो दुःखयोनय एव ते अविद्याकृतत्वात्। दृश्यन्ते हि आध्यात्मिकादीनि दुःखानि तन्निमित्तानि एव।
यथा इह लोके तथा परलोके अपि इति गम्यते एवशब्दात् ।
न संसारे सुखस्य गन्धमात्रम् अपि अस्ति, इति बुद्ध्वा विषयमृगतृष्णिकाया इन्द्रियाणि निवर्तयेत् ।
न केवलं दुःखयोनय आद्यन्तवन्तः च आदिः विषयेन्द्रियसंयोगो भोगानाम् अन्तः च तद्वियोग एव।
अत आद्यन्तवन्तः अनित्या मध्यक्षण-भावित्वाद् इत्यर्थः ।
कौन्तेय न तेषु भोगेषु रमते बुधो विवेकी अवगतपरमार्थतत्त्वः, अत्यन्तमूढानाम् एव हि विषयेषु रतिः दृश्यते, यथा पशुप्रभृतीनाम् ॥ २२ ॥
अयं च श्रेयोमार्गप्रतिपक्षी कष्टतमो दोषः सर्वानर्थप्राप्तिहेतुः दुर्निवार्यः च इति तत्परिहारे यत्नाधिक्यं कर्तव्यम् इति आह भगवान्—