कामक्रोधोद्धवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥ २३ ॥
śakrotīhaiva yaḥ soḍhuṃ prākśarīravimokṣaṇāt.
kāmakrodhoddhavaṃ vegaṃ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ.. 23 ..
जो मनुष्य यहाँ—जीवितावस्था में ही शरीर छूटने से पहले-पहले अर्थात् मरणपर्यन्त (काम-क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को) सहन कर सकता है अर्थात् सहन करने का उत्साह रखता है (वही युक्त और सुखी है)।
जीवित पुरुषके अन्त:करणमें काम-क्रोधका वेग अवश्य ही होता है, इसलिये मरणपर्यन्त की सीमा की गयी है; क्योंकि वह काम-क्रोध-जनित वेग अनेक निमित्तोंसे प्रकट होनेवाला है, अत: मरने तक उसका विश्वास न करे। (सदैव उससे सावधान रहे) यह अभिप्राय है।
किसी अनुभव किये हुए सुखदायक इष्ट-विषय के इन्द्रियगोचर हो जाने पर यानी सुन जाने पर या स्मरण हो जाने पर उसको पाने की जो लालसा—तृष्णा होती है, उसका नाम काम है।
वैसे ही अपने प्रतिकूल दुःखदायक विषयों के दीखने, सुनायी देने या स्मरण होने पर उनमें जो द्वेष होता है उसका नाम क्रोध है।
वे काम और क्रोध जिस वेग के उत्पादक होते हैं वह काम-क्रोध से उत्पन्न हुआ वेग कहलाता है। रोमाञ्च होना, मुख और नेत्रों का प्रफुल्लित होना इत्यादि चिह्नोंवाला जो अन्तःकरण का क्षोभ है, वह काम से उत्पन्न हुआ वेग है। तथा शरीर का काँपना, पसीना आ जाना, होठों को चबाने लगना, नेत्रों का लाल हो जाना इत्यादि चिह्नोंवाला वेग क्रोध से उत्पन्न हुआ वेग है।
ऐसे काम और क्रोध के वेग को जो सहन कर सकता है, उसको सहन करने का उत्साह रखता है वह मनुष्य इस संसार में योगी है और वही सुखी है ॥ २३ ॥
ब्रह्म में स्थित हुआ कैसा पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होता है ? सो कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
शक्नोति उत्सहते इह एव जीवन् एव यः सोढुं प्रसहितुं प्राक् पूर्वं शरीरविमोक्षणात् आ-मरणात्।
मरण सीमाकरणं जीवतः अवश्यम्भावी हि कामक्रोधोद्भवो वेगः अनन्तनिमित्तवान् हि स इति, यावद् मरणं तावद् न विश्रम्भणीय इत्यर्थः।
काम इन्द्रियगोचरप्राप्ते इष्टे विषये श्रूयमाणे स्मर्यमाणे वा अनुभूते सुखहेतौ या गर्धिः तृष्णा स कामः ।
क्रोधः च आत्मनः प्रतिकूलेषु दुःखहेतुषु दृश्यमानेषु श्रूयमाणेषु स्मर्यमाणेषु वा यो द्वेषः स क्रोधः।
तौ कामक्रोधौ उद्भवौ यस्य वेगस्य स कामक्रोधोद्भवो वेगः रोमाञ्चनहृष्टनेत्रवदनादि- लिङ्गः अन्तःकरणप्रक्षोभरूपः कामोद्भवो वेगः । गात्रप्रकम्पप्रस्वेदसन्दृष्टौष्ठपुटरक्तनेत्रादि- लिङ्गः क्रोधोद्भवो वेगः ।
तं कामक्रोधोद्भवं वेगं य उत्सहते प्रसहते सोढुं प्रसहितुं स युक्तो योगी सुखी च इह लोके नरः ॥ २३ ॥
कथम्भूतः च ब्रह्मणि स्थितो ब्रह्म प्राप्नोति इति आह—